भाजपा नेता ने अपनी ही सरकार पर लगाए आरोप, सीमांत क्षेत्रों की अनदेखी का मुद्दा गरमाया

भाजपा नेता ने अपनी ही सरकार पर लगाए आरोप, सीमांत क्षेत्रों की अनदेखी का मुद्दा गरमाया

स्थान : लोहाघाट (चंपावत)
ब्यरो रिपोर्ट

उत्तराखंड में सत्तारूढ़ दल के भीतर ही असंतोष के स्वर उभरने लगे हैं। भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश सह-संयोजक प्रवीन पांडे ने अपनी ही पार्टी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि लोहाघाट ब्लॉक के सीमांत गांव भी विकास से वंचित हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पा रहा है।

प्रवीन पांडे ने कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में प्रदेश और चंपावत जिले में कई विकास कार्य हो रहे हैं, लेकिन लोहाघाट ब्लॉक के सीमांत क्षेत्रों की लगातार अनदेखी की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सीमांत क्षेत्रों के विकास पर विशेष जोर दिए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर स्थिति संतोषजनक नहीं है।

उन्होंने आरोप लगाया कि लेटी डूंगरा और आसपास के गांव भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं। जल जीवन मिशन जैसी महत्वपूर्ण योजना का लाभ भी यहां तक नहीं पहुंच पाया है, जिसके कारण ग्रामीणों—खासतौर पर महिलाओं—को 2 से 3 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है। गर्मियों में जल संकट और गहराने की आशंका जताई गई है।

शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए पांडे ने कहा कि जूनियर हाई स्कूल का उच्चीकरण न होने के कारण क्षेत्र के छात्रों को करीब 15 किलोमीटर दूर मडलक इंटर कॉलेज जाना पड़ता है। आर्थिक तंगी के चलते कई छात्र-छात्राएं पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर हैं।

उन्होंने बताया कि इन समस्याओं को लेकर कई बार जिलाधिकारी के माध्यम से और स्वयं पत्राचार कर समाधान की मांग की गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पांडे ने लोहाघाट विधायक पर भी क्षेत्र की उपेक्षा के आरोप लगाए और कहा कि विधायक निधि का समुचित उपयोग तक नहीं किया गया, खासकर अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित फंड भी नहीं पहुंचा।

भाजपा नेता ने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही सीमांत क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो 2027 के चुनाव में पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार में होने के बावजूद उन्हें जनता और विपक्ष के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है।

इस पूरे मामले ने राजनीतिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। सीमांत क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की कमी और बढ़ते पलायन को लेकर उठे ये सवाल अब सरकार और प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं।