
स्थान -हल्द्वानी

ब्यूरो रिपोट

सुप्रीम कोर्ट में हल्द्वानी के बनभूलपुरा स्थित रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने दोनों पक्षों—रेलवे और उत्तराखण्ड सरकार—की दलीलों पर कड़ी टिप्पणी की।


रेलवे की ओर से प्रस्तुत हलफनामे में बताया गया कि कुल 13 मामले फ्रीहोल्ड भूमि के हैं और इनके लिए मुआवजे का प्रस्ताव रखा गया है। जिन लोगों को हटाया गया है, उनके लिए राज्य सरकार वैकल्पिक आवासीय व्यवस्था मुहैया कराने का प्रस्ताव लेकर आई है। रेलवे ने यह भी कहा कि हटाए गए लोग सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से रह रहे थे और मुआवजा मानवीय आधार पर ही दिया जा रहा है।

वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने अदालत में कहा कि प्रभावित लोगों की संख्या 50 हजार से अधिक है और इनमें से कई प्रधानमंत्री आवास योजना के पात्र नहीं हैं। उन्होंने जोर दिया कि लंबे समय से बसे लोगों के पुनर्वास और बस्तियों के नियमितिकरण पर विचार किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान CJI ने कहा कि प्रभावित लोगों की संख्या 50 हजार हो सकती है, लेकिन परिवारों की संख्या उतनी अधिक नहीं होगी। उन्होंने यह भी पूछा कि सार्वजनिक भूमि पर दावा कैसे किया जा रहा है, जबकि वहां अनाधिकृत कब्जा था। CJI ने ASG Aishwarya Bhati से सरकारी आवास देने के प्रस्तावों के बारे में विस्तार से पूछा। भाटी ने तीन कैटेगरी—EWS, लो कैटेगरी और सेमी लो कैटेगरी—के तहत आवास उपलब्ध कराने की जानकारी दी।

CJI ने यह भी सवाल उठाया कि इस क्षेत्र में बेसिक सुविधाएं जैसे सीवेज आदि नहीं हैं, तो हाउसिंग योजना के तहत घर लेने में क्या समस्या है।

मामले की अगली सुनवाई में पुनर्वास, मुआवजा और भूमि स्वामित्व से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र से जुड़े इस विवाद पर पूरे प्रदेश की नजर बनी हुई है।

