अमावस्या की रात: अंधविश्वास नहीं, जंगली जीवन है असली खतरा

अमावस्या की रात: अंधविश्वास नहीं, जंगली जीवन है असली खतरा

लोकेशन: काशीपुर

रिपोर्टर : अज़हर मलिक

तराई पश्चिमी डिवीजन। अमावस्या की रात—जब अँधेरा चारों ओर फैल जाता है और दीयों की मंद रोशनी में अजीब सी शांति होती है—कुछ लोग अंधविश्वास की काली मशाल जलाते हैं। इस पर डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य ने सख्त चेतावनी जारी की है।

उन्होंने कहा कि तंत्र, मंत्र और उल्लू की पूजा जैसे कर्मकाण्ड न केवल अवैध हैं, बल्कि जंगली जीवन के लिए भी खतरनाक हैं। अमावस्या और दीपावली की रात अक्सर संरक्षित क्षेत्रों में अनधिकृत प्रवेश और जंगली जीवों को परेशान करने का कारण बनती है।

प्रकाश चंद्र आर्य ने स्पष्ट किया: “किसी भी व्यक्ति को अवैध रूप से संरक्षित क्षेत्र में जाने, पक्षियों को परेशान करने, या उल्लू जैसे रात्रिचर जीवों को छेड़ने की अनुमति नहीं है। अब यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”

डीएफओ ने कहा कि अंधविश्वास के नाम पर किए जाने वाले इन कर्मकाण्डों से न केवल इंसान खतरे में पड़ते हैं, बल्कि जंगली जीवन भी बिखर जाता है। उनका संदेश सख्त है: “यही रात है जब आप विरासत बचा सकते हैं—या उसे हमेशा के लिए खो सकते हैं।”

सरकारी चेतावनी साफ़ है: अंधविश्वास के नाम पर किसी भी जीव को नुकसान पहुँचाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

संदेश साफ: रीति-रिवाज निभाएं, लेकिन प्रकृति और जंगली जीवन की सुरक्षा कभी न भूलें। ऊँघते उल्लू और अँधेरी आँखे भी जीने का हक रखती हैं।