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रिपोर्टर – भगवान मेहरा

स्थान- कालाढूंगी

उत्तराखंड राज्य के कुमाऊँ मंडल का प्राचीन और प्रसिद्ध लोकनृत्य गान हैं| झोड़ा जो आज के दौर मैं अपना अस्तित्व और पहचान खोता जा रहा है, ऐसे मैं कोटाबाग निवासी दीपक आर्या ने कुमाऊँ की संस्कृति को बचाने का प्रयास किया है| अपने झोड़ा गायन से। आधुनिकता की इस दौड़ मैं कुमाऊँ का प्रसिद्ध झोड़ा आज शायद ही कहि गाया| या फिर सुना जाता हो, ऐसे समय मैं लोग दीपक की गायकी से प्रभावित है, और दीपक को भी लोगो से खूब स्नेह मिल रहा है। झोड़ा उत्तराखंड का एक लोकनृत्य गान है। यह उत्तराखंड के कुमाउनी क्षेत्र में गाया औऱ प्रदर्शित किया जाता है।


लोकनृत्य गान इसलिए बोला , यह एक ऐसा लोक नृत्य है, जिसमे स्थानीय लोग सामुहिक रूप से हाथ पकड़ कर वृत्ताकार ,पदताल मिलाते हुए नाचते हैं । और साथ – साथ लोक गीत भी गाते हैं। बीच मे एक वाद्य यंत्र बजाने वाला होता है। जो पद बोलता है, और गोल घेरे में हाथ पकड़ कर ,एक विशेष चाल में नाचने वाले स्त्री पुरूष उन पदों को दोहराते हैं। और कहीं -कही स्त्री दल एक पद की शुरुआत करते हैं, और पुरूष दल उन्हें दोहराते हैं।

झोड़ा नृत्य में हाथों में हाथ डालकर ,उन्मुक्तता के साथ निश्चित गति और लय पर एक खास शैली के साथ ,गोलाकार घेरे में नृत्य करने वाले पुरुष व महिलाएं ,हुड़के की थाप पर इस लोकनृत्य का आयोजन करते हैं। यह एक सामुहिक नृत्य है। चैत्र मास में तथा मेलों और शुभ धार्मिक कार्यों ,विवाह आदि के अवसर पर झोड़ा नृत्य का आयोजन किया जाता है। झोड़ा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के झटति से मानी जाती है। इसमे पद संचालन और लय दोनों तेज होते हैं।


