


रिपोर्ट भगवान सिंह

श्रीनगर गढ़वाल

– लोकसंस्कृति, परंपरा और अस्मिता के संरक्षण के उद्देश्य से आयोजित ‘धरोहर संवाद 2025’ के दूसरे दिन श्रीनगर गढ़वाल में ढोल-दमौ की संचारात्मक प्रस्तुतियों ने समां बांधा। लोकवाद्य की ध्वनि के साथ आयोजन ने उत्तराखंड की गूढ़ सांस्कृतिक जड़ों को फिर से जीवंत कर दिया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रांत कार्यवाह दिनेश सेमवाल ने इस अवसर पर “ई-धरोहर” पोर्टल का शुभारंभ किया। यह डिजिटल मंच उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, लोकसाहित्य और पारंपरिक ज्ञान का एक संग्रहालय होगा, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और जानकारी का स्रोत बनेगा।



दिनेश सेमवाल ने अपने संबोधन में कहा,
“अपनी संस्कृति का मूल मंत्र है – अपने स्व को जागृत करना। जब तक हम अपने संस्कारों, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक संरक्षण असंभव है।”
उन्होंने भारतीय संस्कृति को “उद्दात संस्कृति” बताते हुए कहा कि इसमें जड़-चेतन, जीव-निर्जीव सभी के प्रति सम्मान का भाव है। उन्होंने यह भी बताया कि धरोहर ट्रस्ट ने लोकदेवता गोलज्यू महाराज के संदेश को लेकर केदारखण्ड और मानसखण्ड को जोड़ने वाली एक भव्य यात्रा की शुरुआत की है।



चिंतन शिविर के रूप में रहा आयोजन
कार्यक्रम के मुख्य सूत्रधार व रंगकर्मी प्रो. डी. आर. पुरोहित ने इसे एक चिंतन शिविर बताया। उन्होंने कहा:



“यह आयोजन सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण-संवर्धन के लिए दिशा तय करने का प्रयास था। सरकार और समाज दोनों को मिलकर सटीक काम करना होगा।”
मंच से निकली गूंज: संस्कृति सीमित न रहे
संस्कृतिकर्मी नीलम जुयाल ने इस अवसर पर कहा:



“संस्कृति सिर्फ मंचों तक सीमित न रहे, यह सोच इस आयोजन की आत्मा थी। हमारी असली धरोहर हमारी भाषा, हमारी परंपराएं और हमारे संस्कार हैं – यही हमारी पहचान बनाते हैं।”

‘धरोहर संवाद 2025’ का यह दो दिवसीय आयोजन सिर्फ एक सांस्कृतिक मंच नहीं, बल्कि एक आंदोलनात्मक पहल बनकर सामने आया है, जो आने वाले समय में उत्तराखंड की लोक-संस्कृति को नया जीवन देने का काम करेगा।


