

रिपोर्टर -सलीम अहमद

स्थान -रामनगर

रामनगर के ग्राम सावल्दे से सावन के पहले सोमवार को श्रद्धालुओ का एक जत्था कावड़ यात्रा के लिए हरिद्वार हर की पेड़ी के लिए रवाना हुआ।


बताया जाता है कि सावन के महीने में देशभर में खास तौर पर उत्तर भारत में कांवड़ यात्रा काफी ज्यादा प्रचलित है। कांवड़ यात्रा का वर्णन हिन्दु धर्म की कई प्राचीन ग्रन्थो में अलग अलग तरीके से देखने को मिलता है। कांवड़ यात्रा को लेकर एक मान्यता ये है कि दुनिया के इतिहास का पहला कांवड़िया लंकापति रावण था। वेदो के अनुसार कांवड़ की परंपरा समुन्द्र मंथन के समय में ही पड़ गई थी। ऐसा माना जाता है कि जब संमुद्र मंथन के दौरान समुद्र में से विष निकला था तो पूरी दुनिया में तबाही आ गई थी। तब भगवान शिव ने संमुद्र मंथन के दौरान निकलने वाले विंंष को पी लिया था


जिसकी वजह से उनका पूरा शरीर नीला पड़ गया था। भगवान शिव ने इस विष को अपने गले में रख लिया था। रावण भगवान शिव का परम भक्त था। उसने कई दिनो तक तपस्या करने के बाद गंगा के जल से पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक किया था। रावण के इस अभिषेक की वजह से ही भगवान शिव के अंदर विष की वजह से आई नकारात्मक ऊर्जा दूर हुई थी।

कांवड़ यात्रा को लेकर एक मान्यता ये भी है कि इसकी शुरूआत राजा सगर के जमाने में हुई थी। राजा सगर के पुत्रो को तारने के लिए भागीरथ ने गंगा नदी को प्रथ्वी पर आने के लिए मनाने की कोशिश की थी। भागीरथ की वजह से गंगा पृथ्वी पर तो आ गई थी लेकिन उतना वेग इतना ज्यादा तेज थे कि अगर उस वेग से वो धरती पर आ जाती है तो धरती पर मौजूद मिट्टी और पहाड़ तब नष्ट हो जाते। इसी वजह से भगवान शिव ने गंंगा के वेग को शांत करने के लिए उन्हे अपनी जटाओ पर धारण कर लिया था। तभी से ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव को मनाने के लिए उनका गंगा जल से अभिषेक किया गया था।


