

ब्यूरो रिपोर्ट


भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में पारंपरिक कागजी नोटों की जगह पॉलिमर यानी प्लास्टिक नोट लाने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रहा है। यदि यह योजना लागू होती है तो आने वाले समय में लोगों की जेब में रखे नोट अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और लंबे समय तक चलने वाले होंगे।


सूत्रों के अनुसार, हाल ही में RBI की केंद्रीय बोर्ड बैठकों में कागजी नोटों की बढ़ती छपाई लागत और उनके जल्दी खराब होने की समस्या पर विस्तार से चर्चा हुई। इसी के तहत पॉलिमर बैंक नोटों के पायलट प्रोजेक्ट को शुरू करने की योजना पर विचार किया जा रहा है।

RBI की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष में नोटों की छपाई पर 6,372.8 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुए, जबकि इससे पहले यह खर्च 5,101.4 करोड़ रुपये था। बढ़ती लागत को देखते हुए केंद्रीय बैंक ऐसे विकल्प तलाश रहा है जो लंबे समय में अधिक किफायती साबित हों।

विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलिमर नोटों की शुरुआती उत्पादन लागत भले अधिक हो, लेकिन उनकी उम्र कागजी नोटों की तुलना में कई गुना ज्यादा होती है। ये नोट आसानी से फटते नहीं हैं, पानी और नमी से कम प्रभावित होते हैं तथा लंबे समय तक उपयोग में बने रहते हैं।
केंद्रीय बैंक के सामने एक बड़ी चुनौती खराब और फटे नोटों का निस्तारण भी है। वित्त वर्ष 2025 में करीब 23.8 अरब खराब नोटों को चलन से बाहर किया गया, जिनमें सबसे अधिक संख्या 500 और 100 रुपये के नोटों की रही। इससे नोटों के पुनर्मुद्रण और प्रबंधन का खर्च लगातार बढ़ रहा है।


हालांकि डिजिटल भुगतान और UPI का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन देश में नकदी की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, प्रचलन में कुल मुद्रा बढ़कर 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जिससे टिकाऊ करेंसी की आवश्यकता और बढ़ गई है।


भारत में प्लास्टिक नोटों का विचार नया नहीं है। वर्ष 2012 में कुछ चुनिंदा शहरों में 10 रुपये के पॉलिमर नोटों का परीक्षण किया गया था, लेकिन उस समय तकनीकी और मशीन संबंधी चुनौतियों के कारण योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब आधुनिक तकनीक और उन्नत बैंकिंग सिस्टम के चलते इन बाधाओं को काफी हद तक दूर माना जा रहा है।
दुनिया के करीब 60 देशों में पॉलिमर नोट सफलतापूर्वक उपयोग किए जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में सबसे पहले प्लास्टिक नोट जारी किए थे। इसके बाद सिंगापुर, कनाडा, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और रोमानिया जैसे देशों ने भी इस तकनीक को अपनाया। अब सभी की निगाहें RBI पर टिकी हैं कि वह भारत में इस महत्वाकांक्षी परियोजना को कब मंजूरी देता है और भारतीय करेंसी में बड़ा बदलाव कब देखने को मिलता है।

