उत्तराखंड में 2027 चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज

उत्तराखंड में 2027 चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज

उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। एक ओर जहां भाजपा से निष्कासित या अलग हुए कई नेता कांग्रेस का दामन थाम रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर ही असहमति और तनाव के संकेत भी साफ दिखाई दे रहे हैं।

कांग्रेस मुख्यालय में हाल ही में कई नेताओं के शामिल होने पर जश्न का माहौल रहा, लेकिन रामनगर के ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी की सदस्यता अंतिम समय में टाल दी गई। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व विधायक रणजीत रावत की असहमति के चलते यह फैसला लिया गया। इस घटनाक्रम से पार्टी के अंदर खींचतान खुलकर सामने आ गई है।

इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी नाराज बताए जा रहे हैं, जिससे पार्टी नेतृत्व पर दबाव बढ़ गया है।

इसी बीच, पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल के कांग्रेस में शामिल होते ही नया विवाद खड़ा हो गया। रुद्रपुर की पूर्व पालिकाध्यक्ष और पूर्व विधायक मीना शर्मा ने पार्टी में महिला सम्मान की अनदेखी का आरोप लगाते हुए अपने सभी पदों से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी।

मीना शर्मा ने आरोप लगाया कि ठुकराल की एक पुरानी ऑडियो क्लिप में उनके और उनके परिवार के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया था, जिससे वे आहत हैं। उन्होंने पार्टी नेतृत्व से इस मामले में स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है।

वहीं, भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि कांग्रेस अपने ही नेताओं पर भरोसा नहीं कर पा रही है और भाजपा से निकाले गए नेताओं पर निर्भर हो रही है। उन्होंने इसे कांग्रेस की “मजबूरी” करार दिया।

इस बीच, पूर्व विधायक नारायण पाल ने भी कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली है। गौरतलब है कि 2022 विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने पर उन्होंने बसपा के टिकट पर सितारगंज से चुनाव लड़ा था और चौथे स्थान पर रहे थे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दलबदल कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह भाजपा को 2027 में चुनौती देना चाहती है। हालांकि, पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति और नेताओं के बीच मतभेद उसके लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

कुल मिलाकर, उत्तराखंड की सियासत में चुनाव से पहले उठापटक तेज हो गई है, जहां एक तरफ नए समीकरण बन रहे हैं, तो दूसरी तरफ अंदरूनी कलह भी सामने आ रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इन चुनौतियों से कैसे निपटती है और भाजपा अपनी पकड़ को कितना मजबूत बनाए रखती है।