
स्थान : हल्द्वानी
रिपोर्टर : संजय जोशी

अजय भट्ट ने लोकसभा में शून्य काल के दौरान उत्तराखंड के तेजी से खाली होते गांवों का मुद्दा उठाया। उन्होंने राज्य में ‘घोस्ट विलेज’ की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए इन गांवों के पुनर्स्थापन के लिए नई योजना बनाने की मांग की।


सांसद ने बताया कि उत्तराखंड में 1700 से अधिक गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जिन्हें अब भूतिया गांव कहा जाने लगा है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति राज्य के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

उन्होंने सदन को जानकारी दी कि जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार राज्य में 1048 गांव पहले ही गैर-आबाद घोषित हो चुके थे। वहीं उत्तराखण्ड ग्रामीण विकास एवं प्रवासन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 तक यह संख्या बढ़कर 1700 से अधिक हो गई है।

अजय भट्ट ने कहा कि रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसके चलते गांवों में खेती-बाड़ी ठप हो गई है, घर खाली पड़े हैं और जमीन बंजर होती जा रही है। जो गांव कभी सांस्कृतिक गतिविधियों से गुलजार रहते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा हुआ है।
उन्होंने यह भी बताया कि इन खाली गांवों में अब जंगली जानवरों का कब्जा बढ़ता जा रहा है। बाघ, तेंदुआ, भालू और अन्य वन्यजीव इन क्षेत्रों में घूमते नजर आते हैं, जिससे इन गांवों का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है।

सांसद ने कहा कि नरेन्द्र मोदी की ‘वाइब्रेंट विलेज योजना’ से सीमावर्ती क्षेत्रों में पलायन रोकने में मदद मिल रही है, लेकिन मध्य हिमालय के गांवों के लिए भी ऐसी ही विशेष योजना की जरूरत है। उन्होंने सरकार से मांग की कि इन गांवों में रिवर्स पलायन को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और ग्रामीण जीवन को बचाया जा सके।


