
स्थान : ऋषिकेश
ब्यूरो रिपोर्ट

ऋषिकेश वन भूमि प्रकरण में आरटीआई के माध्यम से मांगे गए दस्तावेज़ों ने मामले में नया मोड़ ला दिया है।

इस खुलासे का नेतृत्व चंद्रभूषण शर्मा ने किया। उन्होंने प्रेस वार्ता में बताया कि 31 दिसंबर, 2025 को उन्होंने वन विभाग से 17 बिंदुओं पर जानकारी के लिए आरटीआई डाली थी।


प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, इस भूमि को 12 दिसंबर, 1910 को वन विभाग में शामिल किया गया था। लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान 7 फरवरी, 1927 को इसे आरक्षित वन की श्रेणी से हटा दिया गया था।

यह तथ्य इस विवाद का नया आयाम पेश करता है।

चंद्रभूषण शर्मा ने कहा कि अगर भूमि को 1927 में ही वन क्षेत्र से बाहर कर दिया गया था, तो वर्तमान में वन विभाग किस आधार पर इस पर अपना दावा कर रहा है।


उन्होंने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्थिति स्थानीय निवासियों और समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
आरटीआई से यह भी खुलासा हुआ कि वन विभाग के पास मीरा बेन को दी गई कथित लीज़ से संबंधित कोई आधिकारिक दस्तावेज़ मौजूद नहीं है।
विभाग के पास लीज़ के रिकॉर्ड न होने की स्थिति में यह तय करना कि लीज़ 99 वर्षों की थी या कितने वर्षों की, साथ ही यह भूमि किस-किस को सब-लीज़ पर दी गई, स्पष्ट नहीं है।
चंद्रभूषण शर्मा ने प्रेस वार्ता में कहा कि अब तक लोग अलग-अलग दिशाओं में इस मामले के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन आरटीआई के माध्यम से मिले पुख्ता दस्तावेज़ों के आधार पर अब समुदाय एकजुट होकर कानूनी लड़ाई लड़ सकता है।

उन्होंने स्थानीय निवासियों और समाज से अपील की कि वे इस मुद्दे पर मिलकर एक ठोस और सही दिशा में काम करें।
उनका कहना था कि सामूहिक प्रयास से ही भूमि के वास्तविक हक़ की रक्षा की जा सकती है।
अधिकारियों और स्थानीय नेताओं के अनुसार, यह खुलासा आने के बाद भविष्य में इस भूमि को लेकर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई तेज हो सकती है।
अब समाज और प्रशासन के बीच बातचीत और न्यायिक प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

