चंपावत के पर्वतीय क्षेत्रों में आलू की बुवाई जोरों पर, महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण

चंपावत के पर्वतीय क्षेत्रों में आलू की बुवाई जोरों पर, महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण

स्थान: चंपावत

ब्यूरो रिपोर्ट

चंपावत जिले के पर्वतीय क्षेत्रों में इस समय किसानो की आर्थिकी का आधार माने जाने वाले आलू की बुवाई जोरों-शोरों पर चल रही है।

जिले के लोहाघाट क्षेत्र के कोली ढेक, बिसंग, रायनगर चौड़ी, सुई, कलीगांव, फोर्ती सहित अन्य क्षेत्रों में बड़ी संख्या में आलू के खेत तैयार किए जा रहे हैं और बुवाई का कार्य तेज़ी से हो रहा है।

इस बार की बुवाई में महिलाओं की भागीदारी भी विशेष रूप से देखी जा रही है। महिलाएं पावर ट्रेलर चलाकर खेत तैयार कर रही हैं और समूह में आलू की बुवाई में सक्रिय योगदान दे रही हैं।

कुछ किसान अभी भी पारंपरिक तरीके से बैलों की मदद से खेत जुताई कर रहे हैं, हालांकि पावर ट्रेलर आने से हल-बैल अब गांवों में कम देखने को मिलते हैं।

जिला उद्यान अधिकारी मोहित मल्ली ने बताया कि विभाग के माध्यम से किसानों को उचित दरों पर आलू के बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि इस बार कुछ किसानों को प्रयोग के तौर पर विदेशी बैगनी आलू भी दिया गया है, और यदि इसके परिणाम अच्छे आते हैं तो अगले वर्ष जिले में बैगनी आलू की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।

कोली ढेक क्षेत्र के आलू उत्पादक गिरीश ढेक, प्रकाश ढेक, श्रीमती गंगा ढेक और बृजेश जोशी ने बताया कि सरकार के माध्यम से समिति द्वारा उन्हें आलू के बीज के लिए ऋण और उद्यान विभाग के द्वारा बीज उपलब्ध कराया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि पर्वतीय खेती अधिकतर बारिश पर निर्भर करती है और समय पर बारिश न होने पर आलू की पैदावार प्रभावित होती है।

किसानों ने जंगली जानवरों के द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाने की भी बात कही। उन्होंने शासन प्रशासन से सुरक्षा, चकबंदी, घेरबाढ़ और सिंचाई जैसी सुविधाओं की मांग की, ताकि खेती और उत्पादन पर कोई विपरीत असर न पड़े।

आलू की खेती इस क्षेत्र के किसानों की आर्थिकी की रीढ़ की हड्डी मानी जाती है।

इसके बावजूद पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन और जंगली जानवरों की दिक्कतों के कारण खेती का दायरा सीमित हो चुका है। कई लोग खेती-बाड़ी और पशुपालन छोड़ चुके हैं।

फिर भी लोहाघाट के इन क्षेत्रों में किसान खेती और पशुपालन के माध्यम से अपनी आजीविका चला रहे हैं। उनका कहना है कि आलू की खेती से ही पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक स्थिरता बनी रहती है

और यदि प्रशासन उचित सहायता प्रदान करे तो उत्पादन और विकास में वृद्धि हो सकती है।