
स्थान -रामनगर
संवाददाता- सलीम अहमद साहिल
तराई पश्चिमी वन प्रभाग, रामनगर के जंगलों में तैनात वन्यजीव रक्षक आज केवल जंगलों की ही नहीं, बल्कि उन बेज़ुबान जीवों की भी रक्षा कर रहे हैं, जिनसे डरकर अक्सर इंसान उनका जीवन छीन लेता है। बात सरीसृप प्रजाति—खासतौर पर सांपों—की है, जिन्हें देखते ही ग्रामीण भयभीत हो जाते हैं और कई बार अज्ञानता में उनकी हत्या कर दी जाती है।


हकीकत यह है कि सरीसृप प्रजाति के जीव तभी हमला करते हैं, जब उन्हें अपने जीवन पर खतरा महसूस होता है। ऐसे जीवों को सुरक्षित बचाना वन विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती होती है।

इसी चुनौती को साहस, संवेदनशीलता और ईमानदारी के साथ निभा रहे हैं तराई पश्चिमी वन प्रभाग के दो जांबाज़ कर्मचारी—तालिब हुसैन और वाहिद।


वन्यजीव रक्षक तालिब हुसैन बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 2005 से 2026 तक करीब 40 हजार सांपों का सुरक्षित रेस्क्यू किया है।

ये वही लोग हैं जो अपनी जान की परवाह किए बिना, दूसरों की जान बचाने और वन्यजीवों को नया जीवन देने में जुटे रहते हैं। तालिब बताते हैं कि रेस्क्यू के दौरान उन्हें कोबरा जैसे अत्यंत विषैले सांप भी काट चुके हैं, कई बार उनकी जान पर बन आई, लेकिन उनके जज़्बे में कभी कमी नहीं आई।

तालिब हुसैन का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—
“सांप को मारना समाधान नहीं है। अगर आबादी क्षेत्र में कहीं भी सांप दिखाई दे, तो घबराएं नहीं, तुरंत वन विभाग या हमारी टीम को सूचना दें। हम मौके पर पहुंचकर सुरक्षित रेस्क्यू करेंगे।”


आज का दिन इसका जीवंत उदाहरण बना, जब वन विभाग की टीम ने तीन अजगर और एक स्पेक्टेकल्ड कोबरा को आबादी क्षेत्र से सुरक्षित रेस्क्यू कर उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया।
एक ओर जहां पूरा देश 77वां गणतंत्र दिवस हर्षोल्लास के साथ मना रहा था, वहीं दूसरी ओर वन विभाग के ये कर्मवीर अपनी जान हथेली पर रखकर विषैले सांपों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचा रहे थे—उन्हें मौत नहीं, बल्कि नया जीवन दे रहे थे।

यह केवल रेस्क्यू की कहानी नहीं, बल्कि मानवता, संवेदनशीलता और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की वह मिसाल है, जो समाज को यह सिखाती है कि सह-अस्तित्व ही असली विकास है।

