
स्थान : लोहाघाट (चंपावत)
ब्यूरो रिपोर्ट
उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रदेश के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन भी दूरस्थ और सीमांत क्षेत्रों में कई जरूरतमंद लोग इन योजनाओं के लाभ से वंचित हैं। ऐसा ही एक मामला चंपावत जिले की लोहाघाट विधानसभा के सीमांत क्षेत्र पासम के नगरू घाट से सामने आया है, जहां रहने वाली विधवा महिला खीमा देवी आज भी बुनियादी सरकारी सहायता से दूर हैं।


खीमा देवी के पति संतोक सिंह का करीब पांच वर्ष पूर्व बीमारी के चलते निधन हो गया था। वे परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। पति के निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह चरमरा गई। खीमा देवी ने बताया कि उनके तीन बेटियां और एक बेटा है। आर्थिक मजबूरी के चलते बेटे को पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वह कम उम्र में ही परिवार का सहारा बनने के लिए दिल्ली में नौकरी कर रहा है। वहीं एक बेटी भी गरीबी के कारण स्कूल छोड़ चुकी है।

खीमा देवी ने बताया कि उनकी दो बेटियां वर्तमान में कक्षा 11 में राजकीय इंटर कॉलेज रोसाल में पढ़ रही हैं, लेकिन उनकी फीस माफ नहीं की गई है। स्कूल पहुंचने के लिए बेटियों को रोज नगरू घाट से करीब आठ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। गाड़ी का किराया देने तक के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं।


परिवार के भरण-पोषण के लिए खीमा देवी बोझा ढोने और मजदूरी करने को मजबूर हैं, लेकिन मजदूरी भी रोज नहीं मिल पाती। उन्होंने बताया कि पहले उनके खेतों में खेती होती थी, लेकिन गूल टूटने के कारण खेतों तक पानी नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे खेत पूरी तरह बंजर हो चुके हैं।

खीमा देवी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार द्वारा गरीबों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन उन्हें आज तक इनका लाभ नहीं मिला। न तो उन्हें अटल आवास योजना का लाभ मिला है, न गौशाला और न ही खाद्य सुरक्षा योजना के तहत राशन कार्ड बन पाया है। इसके चलते बच्चों के लालन-पालन में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।


उन्होंने बताया कि उनकी एक बेटी शादी योग्य हो चुकी है, जिसकी चिंता उन्हें लगातार सताती रहती है। इसके अलावा पति के इलाज के दौरान लिया गया कर्ज भी अभी तक पूरी तरह चुक नहीं पाया है, जिसे वे मजदूरी करके धीरे-धीरे चुका रही हैं।

खीमा देवी ने जिलाधिकारी चंपावत से सहायता की गुहार लगाई है। उन्होंने मांग की है कि उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाया जाए और उनके खेतों की गूल की मरम्मत कराई जाए, ताकि वे खेती कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें। उन्होंने विश्वास जताया कि जिस तरह जिलाधिकारी जरूरतमंदों की मदद कर रहे हैं, उसी तरह उनकी भी मदद अवश्य होगी।

पति की मौत के बाद भी हिम्मत न हारने वाली खीमा देवी आज खतरनाक पहाड़ी रास्तों पर भारी बोझ ढोते हुए या मजदूरी करते हुए देखी जा सकती हैं। कठिन परिस्थितियों के बावजूद वह अपने बच्चों और मवेशियों का पालन-पोषण कर रही हैं। यदि सरकारी सहायता समय पर मिल जाए, तो इस संघर्षशील महिला का जीवन कुछ हद तक आसान हो सकता है।

