

स्थान : देहरादून
ब्यूरो रिपोर्ट


भारतीय जनता पार्टी ने नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर एक तीर से कई राजनीतिक निशाने साधे हैं। इस फैसले को जहां पार्टी के भीतर संगठनात्मक संतुलन और सामाजिक समीकरण साधने के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं इसे आने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी अहम माना जा रहा है।


नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने सबसे पहले कायस्थ समाज के उस पारंपरिक वोट बैंक को सहेजने की कोशिश की है, जो हाल के वर्षों में बिखरता नजर आ रहा था। कायस्थ वर्ग देश के कई राज्यों में प्रभावशाली रहा है और पश्चिम बंगाल में इसकी विशेष राजनीतिक व सामाजिक पकड़ मानी जाती है। ऐसे में नबीन की नियुक्ति को ‘मिशन बंगाल’ की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।


पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह फैसला और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। बंगाल में कायस्थ समाज की संख्या और प्रभाव दोनों ही काफी मजबूत हैं। राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु भी कायस्थ समाज से आते थे। बंगाल में मित्रा, बोस, घोष, दत्ता, पालित, नंदी, गुहा, चंद्रा, धर और सिल जैसे सरनेम वाले लोग इसी वर्ग से जुड़े माने जाते हैं। स्वामी विवेकानंद, श्री अरबिंदो और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसी महान विभूतियां भी कायस्थ समाज से थीं।


भाजपा के युवा और साफ छवि वाले नेता नितिन नबीन पर दांव लगाकर पार्टी ने सवर्ण मतदाताओं, विशेषकर शिक्षित और आर्थिक रूप से सशक्त वर्ग, में अपनी अपील बढ़ाने का प्रयास किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा इस वर्ग को साधने में सफल रहती है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर संभव है और इससे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।


बिहार विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद वहीं से प्रदेश अध्यक्ष और अब राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन को आगे लाकर भाजपा ने संकेत दे दिया है कि पार्टी नेतृत्व भविष्य की राजनीति को लेकर दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रहा है। बंगाल में कायस्थ वर्ग की भूमिका वही मानी जाती है, जो गुजरात में पाटीदार यानी पटेल समाज की है—एक ऐसा वर्ग जो न केवल शिक्षित है बल्कि आर्थिक और सामाजिक रूप से भी सशक्त है।

भाजपा की यह रणनीति केवल बंगाल तक सीमित नहीं मानी जा रही। देश के पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक कायस्थ समाज की व्यापक उपस्थिति को देखते हुए यह फैसला आने वाले कई चुनावों में असर डाल सकता है। साथ ही पार्टी की परंपरा को देखें तो अक्सर कार्यकारी अध्यक्ष ही आगे चलकर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनता है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि भाजपा को उसका अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल चुका है, बस औपचारिक घोषणा शेष है।


कुल मिलाकर नितिन नबीन की नियुक्ति भाजपा की उस सियासी चाल का संकेत है, जिसमें सामाजिक संतुलन, युवा नेतृत्व और आगामी चुनावों की रणनीति—तीनों को साधने की कोशिश साफ नजर आती है।


