पौड़ी में शुरू हुआ ऐतिहासिक मौरी मेला, पांडवों और देवी-देवताओं के दर्शन से लोग हुए मंत्रमुग्ध

पौड़ी में शुरू हुआ ऐतिहासिक मौरी मेला, पांडवों और देवी-देवताओं के दर्शन से लोग हुए मंत्रमुग्ध

स्थान : पौड़ी
ब्यूरो रिपोर्ट

पौड़ी जिले के मुख्यालय से सटे गगवाड़स्यूं घाटी में स्थित मौरी मेला, जो कुंभ और नंदादेवी राजजात की तरह 12 वर्षों में एक बार आयोजित होता है, रविवार 7 दिसंबर से शुरू हो गया। मेले में पांडव और अन्य देवी-देवताओं के अलग-अलग रूपों का अद्भुत दृश्य देखने को मिला।

स्थानीय लोगों का मानना है कि पांडव और अन्य देवी-देवता मेले में व्यक्तियों पर अवतरित होते हैं और अलग-अलग कर्तव्य संपन्न करते हैं, जिन्हें देखकर हर कोई दंग रह जाता है।

मौरी मेला ऐतिहासिक रूप से छह महीने तक तमलाग गांव में और अगले छह महीने कुंडी गांव, कोट ब्लॉक में आयोजित किया जाता है। इस वर्ष के मेले का शुभारंभ पौड़ी विधायक राजकुमार पोरी ने किया। इस दौरान जिला पंचायत अध्यक्ष रचना बुटोला, पौड़ी ब्लॉक प्रमुख अस्मिता नेगी समेत कई अन्य जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

स्थानीय लोगों ने इस मेले को राजकीय मेला घोषित करने की मांग सरकार से की है। विधायक राजकुमार पोरी ने मेले को अलग पहचान दिलाने का आश्वासन भी दिया।

लोककथाओं के अनुसार, मौरी मेला पांडवों की इस क्षेत्र में ठहराव की कथा से जुड़ा है। बताया जाता है कि पांडव कुछ दिन इसी क्षेत्र में रुके थे और स्थानीय लोगों ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया। माता तमलाग को माता कुंती का ससुराल और कुंडी गांव को मायका कहा जाता है।

एक अन्य लोककथा रानी रूपैणा से भी जुड़ी है। रूपैणा, पांडवों की धर्म बहन, का विवाह राजा नारायण से हुआ था। कथानुसार, नारायण किसी कुंड में स्नान करते समय अन्य सुंदरी की मोह में पड़कर अपना राजपाठ और धर्म बहन रूपैणा को भूल जाते हैं। तब उपद्रवी दानव उनके राज्य पर आक्रमण करते हैं और रूपैणा के पुत्रों को मार देते हैं। रूपैणा इस व्यथा को माता कुंती को बताती हैं, और पांडव धर्म बहन का राज्य वापस दिलाकर अपने वचन का पालन करते हैं। यही दान से समृद्धि की संकल्पना मौरी मेले की आत्मा मानी जाती है।

मेला न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि क्षेत्रीय पर्यटन और स्थानीय हस्तशिल्प को भी बढ़ावा देता है।