

स्थान : थराली
रिपोर्टर : मोहन गिरी


उत्तराखंड राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने पर जहां एक ओर पूरे प्रदेश में रजत जयंती समारोह धूमधाम से मनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर पहाड़ी क्षेत्रों से उपेक्षा और धीमे विकास को लेकर राज्य आंदोलनकारियों की पीड़ा भी सामने आई है।


प्रदेश की अस्थायी राजधानी देहरादून से लेकर ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण तक जश्न का माहौल है, लेकिन इन जश्नों के बीच पहाड़ों के लोगों के दिलों में कई सवाल हैं। राज्य बनने के 25 साल बाद भी पहाड़ वही मूलभूत सुविधाओं की जंग लड़ रहा है, जिनके लिए कभी यह राज्य मांगा गया था।


थराली तहसील सभागार में आयोजित राज्य आंदोलनकारी सम्मान समारोह के दौरान आंदोलनकारियों ने स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की बदहाल स्थिति पर गहरी चिंता जताई।


राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि थराली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में आज भी अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं है, विशेषज्ञ चिकित्सकों का अभाव बना हुआ है। मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद अब तक उपजिला चिकित्सालय का निर्माण शुरू नहीं हो पाया, जिससे मरीजों को आज भी देहरादून और ऋषिकेश तक रेफर किया जाता है। प्रसूता महिलाओं को भी जांच के लिए परेशान होना पड़ता है।

राज्य आंदोलनकारी खीमा नंद खंडूरी ने कहा, “राज्य का निर्माण हुआ या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन अब तो नेता भी मानते हैं कि जिन्होंने प्रधान या प्रमुख नहीं बन पाना था, वे आज विधायक और सांसद बन बैठे हैं।” उन्होंने कहा कि पहाड़ों में खेती लगातार संकट में है — कभी भूस्खलन, कभी जंगली जानवरों और बंदरों से फसलें तबाह हो रही हैं। इन परिस्थितियों में किसान खेती छोड़ रहे हैं और पलायन बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा, “25 सालों में पलायन रोकने के नाम पर सिर्फ पलायन आयोग बना दिया गया, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला।”

वहीं राज्य आंदोलनकारी और उत्तराखंड क्रांति दल के नेता भूपाल सिंह गुसाईं ने कहा कि “राज्य बनने की 25वीं वर्षगांठ पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। न तो मूल निवास कानून लागू हो पाया, न गैरसैंण स्थायी राजधानी बन सकी।”

उन्होंने बताया कि थराली की बहुप्रतीक्षित थराली–घाट मोटरमार्ग आज भी अधर में लटका है। यही नहीं, कसबीनगर–खनसर सड़क का काम भी वर्षों से लंबित है। इन सड़कों के बनने से थराली की गैरसैंण से दूरी कम हो जाती, लेकिन सरकारों ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

राज्य आंदोलनकारियों ने लार्ड कर्जन रोड के तहत स्वीकृत ग्वालदम–वाण–तपोवन सड़क परियोजना को ठंडे बस्ते में डालने पर भी चिंता जताई। जबकि यह सड़क आगामी 2026 में होने वाली विश्वप्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

फिलहाल लोक निर्माण विभाग ने थराली से वाण तक 28 करोड़ की लागत से हॉटमिक्स कार्य की निविदा जारी की है, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि “जब तक धरातल पर काम शुरू नहीं होगा, तब तक वादे कागज़ों तक ही सीमित रहेंगे।”


उत्तराखंड के रजत जयंती वर्ष में एक तरफ जहां प्रदेश अपनी उपलब्धियों का जश्न मना रहा है, वहीं दूसरी तरफ पहाड़ों से उठती आवाज़ें याद दिला रही हैं कि राज्य बनने का असली मकसद — विकास, रोजगार और पलायन रोकना — अभी भी अधूरा है।




