

नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने अहमदाबाद एयर इंडिया विमान हादसे की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर दायर याचिका पर केंद्र सरकार और नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) को नोटिस जारी किया है। यह याचिका हादसे में मारे गए पायलट-इन-कमांड कैप्टन सुमित सभरवाल के 91 वर्षीय पिता ने दायर की है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि देश में कोई भी कैप्टन को इस हादसे का जिम्मेदार नहीं मानता। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हादसा था, लेकिन पायलट के पिता को यह बोझ नहीं उठाना चाहिए कि उनके बेटे को दोषी ठहराया जा रहा है। भारत में कोई नहीं मानता कि यह उनकी गलती थी।”




सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में जांच की मांग
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि हादसे की जांच एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में निष्पक्ष, पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुदृढ़ तरीके से कराई जाए।
अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत से कहा, “मैं उस विमान के कमांडर का पिता हूं। मेरी उम्र 91 वर्ष है और अब तक जांच स्वतंत्र रूप से नहीं हो पाई है, जबकि चार महीने बीत चुके हैं।”

इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची की बेंच ने कहा कि 10 नवंबर को इस मामले से जुड़े एक और प्रकरण के साथ सुनवाई की जाएगी।


260 लोगों की मौत, बोइंग विमान की जांच पर उठे सवाल
गौरतलब है कि जून में अहमदाबाद में हुए एयर इंडिया बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर विमान हादसे में 260 लोगों की मौत हुई थी। याचिका में कहा गया है कि यह दुर्घटना “एक्सिडेंट” थी, “इंसिडेंट” नहीं, और इसलिए रूल 12 के तहत निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
विदेशी रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट ने बताया ‘खराब रिपोर्टिंग’
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में पायलट की गलती की ओर संकेत किया है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “हम विदेशी रिपोर्ट्स पर ध्यान नहीं देते। अगर आपको इससे परेशानी है, तो उपाय वहीं करें।”
वहीं न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “भारत में कोई नहीं मानता कि यह दुर्घटना पायलट की गलती से हुई। यह रिपोर्ट बेहद खराब रिपोर्टिंग का उदाहरण है।”

अदालत ने कहा – किसी भी कैप्टन को दोषी नहीं ठहराया जा सकता
बेंच ने साफ किया कि प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में पायलट पर किसी प्रकार का आरोप या इशारा नहीं है। कोर्ट ने कहा, “पायलट का कर्तव्य देश की सेवा है, और ऐसे समय में उन्हें दोष देना न केवल अनुचित है बल्कि भावनात्मक रूप से भी अस्वीकार्य है।”




