


स्थान – हरिद्वार
रिपोर्ट – धर्मराज

उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में एक बरसाती नदी अब कूड़े और गंदगी का गढ़ बन चुकी है। कभी यह नदी बारिश के पानी के निकास की जीवनरेखा मानी जाती थी, लेकिन अब नगरपालिका और ग्राम पंचायतों की लापरवाही की वजह से यह अवैध डम्पिंग का ज़ोन बन गई है।



तस्वीरों में साफ़ देखा जा सकता है कि नदी किनारे प्लास्टिक, पॉलीथिन और अन्य जहरीली चीज़ें खुलेआम पड़ी हैं। गौवंश इन्हें खाते हुए दिखाई दे रहे हैं। जबकि शासन-प्रशासन गौ संरक्षण की बड़ी बातें करता है, वास्तविक स्थिति तस्वीरों में स्पष्ट रूप से दिख रही है।

कूड़ा उठाने वाले कर्मचारी भी अपने हाल से यह कबूल कर रहे हैं कि यह कूड़ा किसके इशारे पर नदी में डाला जा रहा है। सवाल उठता है कि घर-घर से 50 रुपये वसूलने वाली संस्था इस कूड़े का उचित निस्तारण क्यों नहीं कर रही?




पास में स्थित राजकीय पॉलिटेक्निक संस्थान में रोज़ाना सैकड़ों छात्र-छात्राएं पढ़ाई के लिए आते हैं, लेकिन अब उन्हें गंदगी और दुर्गंध के बीच पढ़ाई करनी पड़ रही है। संस्थान की प्रधानाचार्य कई बार संबंधित विभागों को पत्राचार कर चुकी हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।



अब यह चिंता का विषय बन चुका है कि क्या प्रशासन इस गंभीर मसले की ओर ध्यान देगा? क्या इस नदी को उसकी प्राकृतिक पहचान वापस मिलेगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या छात्रों को सुरक्षित और स्वच्छ शैक्षणिक माहौल प्रदान किया जाएगा?

यह मामला न केवल पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर है, बल्कि हरिद्वार के नागरिकों और विद्यार्थियों के जीवन की गुणवत्ता पर भी सीधे असर डालता है।




