खीरों घाटी में मां उन्याणी देवी को समर्पित खीरों पूर्णमासी मेला संपन्न, टन्गवणा जागरों से गूंजी हिमालयी वादियाँ

खीरों घाटी में मां उन्याणी देवी को समर्पित खीरों पूर्णमासी मेला संपन्न, टन्गवणा जागरों से गूंजी हिमालयी वादियाँ

स्थान-खिरों वैली

संवाद्दाता-संजय कुंवर

भाद्रपद पूर्णिमा के पावन अवसर पर अलकनंदा घाटी के उच्च हिमालयी क्षेत्र खीरों वैली में स्थित मां उन्याणी देवी मंदिर में पारंपरिक खीरों पूर्णमासी मेला बड़े ही श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ संपन्न हुआ। इस पर्व की विशेषता यह रही कि संपूर्ण देव अनुष्ठान ढोल-दमाऊ रहित, केवल पौराणिक टन्गवणा जागरों के साथ आयोजित किया गया, जिनकी गूंज ने पूरी घाटी को भक्तिमय कर दिया।

टन्गवणा जागरों की आध्यात्मिक थाप पर गूंजती रही घाटी
देवी के आह्वान और विदाई के लिए केवल जागर गायन की परंपरा का पालन किया गया। इन पारंपरिक जागरों ने न केवल धार्मिक भावना को जागृत किया बल्कि मां उन्याणी देवी की शक्ति और आस्था का जीवंत अनुभव भी कराया।

हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति
दूर-दराज़ से आए हजारों श्रद्धालुओं ने दुर्गम पथरीले रास्तों को पार कर मां उन्याणी देवी के दिव्य दर्शन किए। बेनाकुली से 3.5 किमी की कठिन चढ़ाई के बाद पहुंचे श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना की और देवी से सुख-समृद्धि की कामना की।

महिलाओं की पारंपरिक प्रस्तुति ने किया मंत्रमुग्ध
मेले के दौरान लामबगड़, माणा, हनुमान चट्टी, बेनाकुली और पांडु नगरी से आईं महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों में सजकर चोफुला, दांकुड़ी, चांचड़ी जैसे लोक गीतों और नृत्यों से पूरे क्षेत्र को भक्ति रस में सराबोर कर दिया।

देव अवतरण और धार्मिक अनुष्ठान
शाम 4 बजे मां उन्याणी देवी सहित लाटू देवता, दाणी देवता, भूमि छेत्रपाल देवता और घंटाकर्ण देवता के पश्वाओं का देव अवतरण हुआ। तत्पश्चात मां उन्याणी देवी का पवित्र गाडू स्नान, दुग्धाभिषेक और मक्खन का लेप कर पूजन सम्पन्न हुआ। अंत में मां ने उपस्थित भक्तों को सुख, समृद्धि और मंगल का आशीर्वाद प्रदान किया।

महा प्रसाद के साथ समापन
मां उन्याणी सेवा समिति द्वारा भव्य भंडारे की व्यवस्था की गई थी, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। मेले का समापन महा प्रसाद वितरण और देवी के आशीर्वचन के साथ हुआ।

ग्राम प्रधान मीना चौहान ने जताया आभार
ग्राम सभा लामबगड़ की प्रधान मीना चौहान ने सभी श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा, “इस दुर्गम घाटी में सीमित संसाधनों में भी सफल आयोजन केवल मां उन्याणी की कृपा से संभव हो सका है। यह आयोजन हमारी आस्था, एकता और परंपरा की जीवंत मिसाल है।”