

लोकेशन- रूड़की
संवाद्दाता- प्रिंस शर्मा

देहरादून। उत्तराखंड सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड को खत्म करने की चर्चा ने सियासी माहौल गरमा दिया है। इसी बीच वरिष्ठ समाजसेवी एवं एडवोकेट मोहम्मद मुबशशीर ने प्रदेश सरकार पर सीधा निशाना साधा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनता को असल मुद्दों से भटकाने के लिए बार-बार नए मुद्दे खड़े कर रही है। उनका कहना है कि फिलहाल उत्तराखंड आपदा प्रभावित प्रदेश है, जहां चारों ओर बाढ़ और भूस्खलन जैसी गंभीर समस्याएं हैं। लेकिन इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए सरकार कभी मस्जिद, अजान, तीन तलाक, यूसीसी, वक्फ बोर्ड और अब मदरसा बोर्ड को लेकर विवाद खड़ा कर रही है।



मोहम्मद मुबशशीर ने कहा कि मदरसे खोलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 से मिलता है, और इसे खत्म करना मुस्लिम समुदाय के हक पर सीधा हमला होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि मदरसा बोर्ड को खत्म करने का फैसला किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा।



उन्होंने बताया कि उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम 2016 के तहत मुस्लिम समुदाय के बच्चों को आलिम, कामिल, फाजिल, फोकानिया और मुंशी जैसी डिग्रियां प्राप्त करने का अधिकार है। वर्तमान में प्रदेश में 500 से अधिक मदरसे संचालित हो रहे हैं, जिनमें हजारों छात्र एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के साथ पढ़ाई कर उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं और कई सरकारी नौकरियां भी हासिल कर चुके हैं।


मुबशशीर ने आरोप लगाया कि सरकार पहले मदरसों की मान्यता की फाइलें लंबित रखती है, फिर मदरसों को सील कर देती है और अब बोर्ड को ही खत्म करने की बात कह रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब संस्कृत को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल उर्दू भाषा को क्यों नज़रअंदाज किया जा रहा है।


अंत में उन्होंने कहा कि यदि सरकार सच में भेदभाव खत्म करना चाहती है तो उसे एक देश, एक शिक्षा नीति लागू करनी चाहिए। सभी बोर्ड को खत्म कर एक राष्ट्रीय शिक्षा बोर्ड बने, ताकि हर बच्चे को समान शिक्षा मिल सके और देश तरक्की कर सके।




