

हरिद्वार

केंद्र सरकार की बहुप्रचारित नमामि गंगे योजना का उद्देश्य गंगा नदी की स्वच्छता और उसके धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व की रक्षा करना है, लेकिन हरिद्वार के लक्सर रोड पर बसे गांव अजीतपुर और आसपास के चार अन्य गांवों में यह योजना स्थानीय अधिकारियों की लापरवाही के कारण अपनी सार्थकता खोती नजर आ रही है।



हरिद्वार से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित अजीतपुर गांव का श्मशान घाट वर्ष 2013 की आपदा में बह गया था। यह घाट मिस्सरपुर, पंजनहेड़ी, जियापोता सहित कुल पांच गांवों के लिए अंतिम संस्कार स्थल था। ग्रामीणों की मांग पर नमामि गंगे योजना के अंतर्गत यहां नए श्मशान घाट के निर्माण की स्वीकृति मिल गई थी, लेकिन स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप और प्रशासन की निष्क्रियता के चलते निर्माण कार्य वर्षों से अधूरा पड़ा हुआ है।




अंतिम संस्कार में हो रही भारी दिक्कतें
ग्रामीणों के अनुसार, घाट नहीं होने के कारण शवों का सम्मानजनक अंतिम संस्कार नहीं हो पा रहा है। कई बार उन्हें खुले में अथवा अस्थायी स्थानों पर संस्कार करना पड़ता है, जो ना केवल धार्मिक दृष्टिकोण से अनुचित है, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी गंभीर चिंता का विषय है।



प्रशासनिक आश्वासन
हरिद्वार के जिलाधिकारी ने इस विषय पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि, “ग्रामीणों की समस्याओं को गंभीरता से लिया गया है। श्मशान घाट का निर्माण कार्य शीघ्र ही पूर्ण कराया जाएगा।” हालांकि, ग्रामीणों का भरोसा टूट चुका है और उनका कहना है कि वे लगातार कई वर्षों से आश्वासन ही सुन रहे हैं, कार्यान्वयन ज़मीनी स्तर पर नहीं दिख रहा।

योजना की गरिमा पर सवाल
2014 में शुरू हुई नमामि गंगे योजना के अंतर्गत पूरे हरिद्वार में कई घाटों और श्मशान स्थलों का निर्माण एवं पुनर्विकास किया गया है,

लेकिन अजीतपुर का मामला एक चुभती हुई मिसाल बन चुका है कि कैसे एक राष्ट्रीय महत्व की योजना स्थानीय स्तर पर लापरवाही का शिकार हो रही है।



