मसूरी में साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा पर संवाद, शालिनी मोदी ने आधुनिक जीवन में ज्योतिष की भूमिका बताई

मसूरी में साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा पर संवाद, शालिनी मोदी ने आधुनिक जीवन में ज्योतिष की भूमिका बताई

स्थान : मसूरी

ब्यूरो रिपोर्ट

पहाड़ों की रानी मसूरी में साहित्य, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने के उद्देश्य से प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा एक विशेष संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य और संस्कृति से जुड़े लोग शामिल हुए।

फाउंडेशन के राइट सर्कल और अहसास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रसिद्ध एस्ट्रोलॉजर और लेखिका शालिनी मोदी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का विषय “माइथोलॉजी विद मॉडर्न लाइफ इन डिवाइन रिलेशनशिप” रखा गया था।

कार्यक्रम के दौरान ज्योतिष, वेद-पुराण और आधुनिक जीवन के बीच संबंधों पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने बताया कि भारतीय पौराणिक परंपराएं केवल धार्मिक कथाएं नहीं हैं, बल्कि जीवन को समझने का गहरा दर्शन भी प्रदान करती हैं।

मुख्य वक्ता शालिनी मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय पौराणिक परंपराओं में जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने के कई महत्वपूर्ण सूत्र मौजूद हैं। उन्होंने अपनी नई पुस्तक “द इटर्नल सन: द लेगेसी ऑफ सूर्य देव” का उल्लेख करते हुए बताया कि भारतीय संस्कृति में सूर्य को ऊर्जा, अनुशासन और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है।

उन्होंने कहा कि आज की नई पीढ़ी करियर, रिश्तों और भविष्य से जुड़े कई सवालों से जूझ रही है। ऐसे में ज्योतिष और पौराणिक ज्ञान जीवन में संतुलन और दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर उन्होंने कहा कि एआई उपयोगी जरूर है, लेकिन ज्योतिष केवल डेटा और एल्गोरिद्म का विषय नहीं है। इसमें अनुभव, परंपरा और गहन अध्ययन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया पर उपलब्ध अधूरी जानकारी से सावधान रहने की भी सलाह दी।

इस अवसर पर ज्योतिष और भारतीय पौराणिक परंपरा की विशेषज्ञ राशी सोबती ने भी श्रोताओं के सवालों के जवाब दिए और कई जिज्ञासाओं का समाधान किया।

फाउंडेशन की अध्यक्ष ईशा गुप्ता ने बताया कि कार्यक्रम में उत्तराखंड की स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक व्यंजनों को भी विशेष रूप से शामिल किया गया। इसमें भांग-जीरे की चटनी, कुलथ दाल के कबाब और झंगोरे की खीर जैसे पारंपरिक व्यंजन परोसे गए।

उन्होंने बताया कि फाउंडेशन साहित्य, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी सक्रिय है और प्लास्टिक प्रदूषण तथा ई-वेस्ट को लेकर जागरूकता अभियान चला रहा है।