जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार पर सवाल: दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में खाली पड़ी पटवारी चौकियां, ग्रामीण परेशान

जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार पर सवाल: दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में खाली पड़ी पटवारी चौकियां, ग्रामीण परेशान

स्थान – उत्तरकाशी

ब्यूरो रिपोर्ट

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देशों पर प्रदेशभर में “जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार” अभियान को बड़े स्तर पर प्रचारित किया जा रहा है। अधिकारी और जनप्रतिनिधि जनता तक सरकारी सेवाएं पहुंचाने के दावे कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से अलग नजर आ रही है।

खासतौर पर दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में हालात यह हैं कि वर्षों से बनी पटवारी चौकियां खाली पड़ी हैं और ग्रामीण छोटे-छोटे कामों के लिए भी दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

जनपद उत्तरकाशी के डुण्डा विकास खंड के दूरस्थ क्षेत्र गाजणा में स्थिति और भी गंभीर है। यहां कमद, श्रीकालखाल और रातलधार में लाखों रुपये की लागत से पटवारी चौकियों का निर्माण कराया गया था। निर्माण कार्य पूरा हुए कई साल बीत चुके हैं

, लेकिन आज तक इन चौकियों में कोई भी पटवारी नियमित रूप से नहीं बैठा। नतीजतन ग्रामीणों को जमीन से जुड़े प्रमाण पत्र, दाखिल-खारिज, निवास प्रमाण पत्र जैसे छोटे-छोटे कार्यों के लिए तहसील कार्यालय के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि एक मामूली कागज के लिए उनका पूरा दिन खराब हो जाता है। दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण तहसील तक पहुंचने में समय, पैसा और मेहनत तीनों लगते हैं। ऐसे में “जन-जन के द्वार” का नारा ग्रामीणों को खोखला प्रतीत हो रहा है।

जिम्मेदारों की सफाई
जब इस संबंध में तहसीलदार डुण्डा अर्पिता गर्खाल से बात की गई तो उन्होंने बताया कि पहले क्षेत्र में पटवारियों की भारी कमी थी। एक ही पटवारी के पास कई गांवों का चार्ज होने के कारण इन चौकियों पर नियमित रूप से बैठना संभव नहीं हो पा रहा था। उन्होंने कहा कि अब नए पटवारी क्षेत्र में तैनात हो गए हैं और जल्द ही इन चौकियों में बैठना शुरू कर दिया जाएगा।

वहीं गंगोत्री विधानसभा क्षेत्र के विधायक सुरेश चौहान से इस मुद्दे पर बात की गई तो उन्होंने तुरंत संज्ञान लेते हुए पटवारियों को सप्ताह में तीन दिन इन चौकियों में बैठने के निर्देश दिए।

फिर भी सवाल बरकरार
हालांकि बड़ा सवाल यह है कि जब लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए ये भवन नई हालत में थे, तब भी इनमें अधिकारी नहीं बैठे, तो अब जब ये भवन उद्घाटन के इंतजार में जर्जर अवस्था में खड़े हैं, तब क्या गारंटी है कि अधिकारी यहां नियमित रूप से बैठेंगे?

ग्रामीणों का कहना है कि केवल निर्देश देने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि पटवारी चौकियों में नियमित उपस्थिति हो और ग्रामीणों को उनके गांव के पास ही सेवाएं मिल सकें।

“जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार” अभियान की सफलता इसी बात पर निर्भर करेगी कि योजनाएं और घोषणाएं कागजों से निकलकर जमीन पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू होती हैं। फिलहाल गाजणा जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में यह अभियान सवालों के घेरे में खड़ा नजर आ रहा है।