

स्थान: विकासनगर
रिपोर्ट: सतपाल धानिया

शक्ति नहर के किनारे बसे छह गांवों में उस समय हड़कंप मच गया जब उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (UJVNL) की जमीन पर वर्षों से बने अवैध निर्माणों को हटाने के लिए प्रशासन बुलडोज़र और भारी पुलिस बल के साथ पहुंचा। सुबह होते ही ढालीपुर से शुरू हुई इस कार्रवाई में कई बुलडोज़र एक साथ गरजने लगे और पूरे इलाके में अफरा–तफरी मच गई।





बुलडोज़र कार्रवाई के बीच तनाव, भीड़ ने रोका तो ठप पड़ा अभियान
पहले ही वार में जब जेसीबी अवैध निर्माण पर चढ़ी, लोग रोते–बिलखते सामान समेटने लगे। माहौल उस समय और तनावपूर्ण हो गया जब पुलिस–प्रशासन का बुलडोज़र मुस्लिम बहुल गांव ढकरानी पहुंचा। यहां ग्रामीणों की भीड़ ने मशीनों को इस कदर घेर लिया कि बुलडोज़र भीड़ के आगे थम गया। करीब एक घंटे तक कार्रवाई पूरी तरह रुकी रही।

स्थिति को देखते हुए पुलिस ने अतिरिक्त बल बुलाया और घेराबंदी कर माहौल को नियंत्रित किया। इस दौरान एक बुजुर्ग अपने मकान की छत पर चढ़कर ध्वस्तीकरण का विरोध करते नजर आए। पुलिस कर्मियों ने जेसीबी मशीन की मदद से बुजुर्ग को सुरक्षित नीचे उतारा, जिसके बाद एक बार फिर तेज़ी के साथ ध्वस्तीकरण शुरू हुआ।


पुलिस की भारी तैनाती, विरोध पर कड़ी निगरानी
एसपी देहात पंकज गैरोला ने बताया कि किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए कई थानों की पुलिस, महिला पुलिस, PAC और जल पुलिस को तैनात किया गया है। उन्होंने कहा कि कार्रवाई में बाधा डालने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। ढकरानी में भीड़ द्वारा बुलडोज़र को घेरने और नोंकझोंक के बावजूद पुलिस ने स्थिति नियंत्रित बनाए रखी।
प्रशासन की बड़ी कार्रवाई: 111 अतिक्रमणों पर चला बुलडोज़र
कार्यवाही का नेतृत्व कर रहे उप जिलाधिकारी विनोद कुमार ने बताया कि शक्ति नहर के किनारे कुल छह गांवों में UJVNL की भूमि पर किए गए अतिक्रमण को हटाया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि 111 अवैध निर्माणों पर ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया चलाई जा रही है और यह अभियान आगे भी जारी रहेगा। भीड़ के विरोध को उन्होंने “सामान्य स्थिति” बताया।





बेघर हुए परिवारों की पीड़ा भी आई सामने
बुलडोज़र कार्रवाई से बेघर हुए लोगों में भारी नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने बिना पर्याप्त समय दिए और तथ्यों की ठीक से जांच किए बिना उनके आशियाने उजाड़ दिए।
तस्वीरों में ग्रामीणों का दर्द साफ झलकता है—

- कोई अपने टूटी दीवारों के बीच रो रहा है
- कोई बच्चे और सामान उठाए सड़क पर भटक रहा है
- कई परिवार पूरी तरह खुले आसमान के नीचे आ गए हैं
ग्रामीणों ने कहा कि अब उनके सामने रहने की जगह और जीवन पुनः शुरू करने की बड़ी चिंता है।

सबसे बड़ा सवाल: अवैध निर्माण सालों तक कैसे चलते रहे?
इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है—
जब सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा और निर्माण हो रहे थे, तब संबंधित विभागों ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
क्या इन निर्माणों पर सांठगांठ या लेन–देन की मिलीभगत रही?
यह सवाल न केवल जांच का विषय है, बल्कि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए प्रशासन की जवाबदेही तय करना भी आवश्यक है।




