

टॉप… हल्द्वानी
रिपोर्ट…ऋषि कपूर


उत्तराखण्ड में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ देने के सरकारी दावों की हकीकत एक बार फिर सामने आ गई है। जहां पर्वतीय जिलों में पहले से ही स्वास्थ्य सेवाएँ दम तोड़ रही हैं, वहीं अब मुख्य शहरों के बड़े अस्पताल भी अव्यवस्थाओं के बोझ तले बिखरते नजर आ रहे हैं।



हल्द्वानी बेस अस्पताल में चार साल पहले करोड़ों की लागत से 10 बेड का अत्याधुनिक आईसीयू बनाया गया था, लेकिन यह यूनिट लंबे समय से बंद पड़ी है। अस्पताल में गंभीर मरीजों को भर्ती करने की सुविधा न होने के कारण डॉक्टरों को रोजाना कई मरीजों को हायर सेंटर रेफर करना पड़ रहा है। महंगी मशीनें भी उपयोग न होने से धूल फांक रही हैं।



स्वास्थ्य महानिदेशक ने भी इस स्थिति पर चिंता जताई है। उन्होंने साफ कहा कि “जब तक आईसीयू के संचालन के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर और तकनीकी स्टाफ उपलब्ध नहीं होंगे, यूनिट चालू करना मुश्किल है।”



मुख्य कारण:
- आईसीयू के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी
- तकनीकी स्टाफ की तैनाती न होना
- मशीनों के रख-रखाव और संचालन के लिए प्रशिक्षित कर्मियों का अभाव

आईसीयू बंद रहने का असर:

- गंभीर मरीजों को दूसरे शहरों के हायर सेंटर में भेजा जा रहा है
- अस्पताल की अत्याधुनिक मशीने बेकार पड़ी हैं
- मरीजों और परिजनों को आर्थिक व मानसिक दोनों तरह की मार

स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन सरकार से सवाल पूछ रहे हैं कि जब करोड़ों रुपये खर्च कर सुविधा बनाई गई, तो उसे चालू रखने के लिए पर्याप्त डॉक्टर और स्टाफ क्यों नहीं नियुक्त किए गए?

फिलहाल आईसीयू का बंद होना प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।


