

ब्यूरो रिपोर्ट


अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते के बाद जी-7 शिखर सम्मेलन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिलचस्पी और बढ़ गई है। फ्रांस में सोमवार से शुरू हो रही इस बैठक में वैश्विक राजनीति, सुरक्षा और तकनीकी मुद्दों पर अहम चर्चा होने की संभावना है।


इस बार सम्मेलन का मुख्य फोकस रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक व्यापार असंतुलन और तेजी से बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के प्रभावों पर रहेगा। साथ ही हाल ही में बने अमेरिका-ईरान शांति समझौते के प्रभावों और उसकी शर्तों पर भी विस्तृत चर्चा की उम्मीद है।


सम्मेलन में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की भी शामिल हो रहे हैं, जो रूस के खिलाफ जारी युद्ध को लेकर जी-7 देशों से समर्थन की अपील करेंगे। वहीं, इस बैठक में AI के बढ़ते खतरे और अवसरों पर भी विशेष सत्र रखा गया है, जिसमें बड़ी टेक कंपनियों के प्रमुख शामिल हो रहे हैं।


इस वर्ष जी-7 की अध्यक्षता फ्रांस के पास है। समूह में शामिल प्रमुख देश—अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा—दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों पर महत्वपूर्ण चर्चा करेंगे।
इतिहास की बात करें तो जी-7 की शुरुआत 1975 में वैश्विक तेल संकट के बाद हुई थी, जब प्रमुख औद्योगिक देशों ने आर्थिक समन्वय के लिए यह मंच बनाया। बाद में रूस के शामिल होने से यह जी-8 बना, लेकिन 2014 में रूस को निलंबित किए जाने के बाद यह फिर से जी-7 बन गया।


इस बार सम्मेलन में भारत सहित कई देशों को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। इसके अलावा AI और डिजिटल सुरक्षा को लेकर ओपनएआई, गूगल और अन्य टेक कंपनियों के अधिकारी भी चर्चा में भाग लेंगे।


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भी इस सम्मेलन में प्रमुख भूमिका में रहने की संभावना है, क्योंकि हाल के दिनों में अमेरिका की व्यापार नीति और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को लेकर कई देशों के साथ मतभेद सामने आए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह जी-7 सम्मेलन केवल आर्थिक चर्चा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह आने वाले समय की वैश्विक राजनीति और तकनीकी दिशा तय करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

