

स्थान-बद्रीनाथ

संवाद्दाता-संजय कुंवर



श्राद्ध पक्ष की शुरुआत के साथ ही भू-वैकुंठ नगरी श्री बद्रीनाथ धाम एक बार फिर श्रद्धा, भक्ति और पितृ-सेवा की भावना से सराबोर हो उठा है। देश के कोने-कोने से आए हज़ारों श्रद्धालु अपने पितरों के मोक्ष की कामना लेकर इस पवित्र धाम में पहुंच रहे हैं।



श्राद्ध पक्ष के प्रारंभ 7 सितंबर (पूर्णिमा) से ही तीर्थयात्रियों का ब्रह्म कपाल तीर्थ में आना शुरू हो गया है। अलकनंदा नदी के पावन तट पर स्थित इस दिव्य स्थल पर श्रद्धालु अपने पितरों के पिंडदान, तर्पण और पूजन कर रहे हैं।

ब्रह्म कपाल का पौराणिक महत्व

बदरीनाथ धाम के तीर्थ पुरोहित श्री कांत बडोला के अनुसार,

“ब्रह्म कपाल तीर्थ में पिंडदान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि यहाँ एक बार पिंडदान कर देने के बाद किसी अन्य तीर्थ में दोबारा पिंडदान की आवश्यकता नहीं रहती। इस स्थान पर किया गया पिंडदान पितरों को मोक्ष और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाता है।”
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस स्थल पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को सीधा मोक्षधाम की प्राप्ति होती है, इसलिए देशभर से श्रद्धालु यहां आकर अपने पितरों का श्राद्ध कर्म करते हैं।
देशभर से उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

श्राद्ध पक्ष में खासकर दक्षिण भारत, मध्य प्रदेश, गुजरात, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों से तीर्थ यात्री बदरीपुरी पहुंच रहे हैं। ब्रह्म कपाल छेत्र में पंडितों और तीर्थ पुरोहितों की दिनभर की पूजा विधि में व्यस्तता साफ झलक रही है।



पिंडदान, तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अलकनंदा घाटों पर सुबह से ही लंबी कतारें देखी जा रही हैं। 16 दिन तक चलने वाले श्राद्ध पक्ष में बदरीनाथ धाम में विशेष चहल-पहल और आध्यात्मिक ऊर्जा का वातावरण बना हुआ है।


