उत्तरकाशी का अनोखा ‘दूध गड्डू मेला’: जहां देवताओं को दूध-दही से नहलाकर मांगी जाती है खुशहाली

उत्तरकाशी का अनोखा ‘दूध गड्डू मेला’: जहां देवताओं को दूध-दही से नहलाकर मांगी जाती है खुशहाली

रिपोर्ट : दीपक नौटियाल
स्थान ; उत्तरकाशी

लोक संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों की बात हो और उत्तराखंड का ज़िक्र न हो — यह संभव नहीं। सीमांत जनपद उत्तरकाशी न सिर्फ अपने प्राकृतिक सौंदर्य, बल्कि पारंपरिक लोक वेशभूषा, पर्व-त्योहारों और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी विशेष स्थान रखता है। इन्हीं पारंपरिक आयोजनों में एक अत्यंत विशिष्ट और अनोखा पर्व है — दूध गड्डू मेला, जिसे मिल्क फेस्टिवल के नाम से भी जाना जाता है।

यह पर्व धनारी और गमरी पट्टी के ग्रामीण हर साल सावन और भाद्रपद की संक्रांति पर बड़े श्रद्धा और उत्साह से मनाते हैं। ग्रामीण करीब 10 किलोमीटर का कठिन पैदल सफर तय कर ‘बेडथात’ नामक स्थल पर पहुँचते हैं, जो घने नेर-थुनेर के जंगलों के बीच स्थित है।

देवताओं का दुग्धाभिषेक – आस्था और कृतज्ञता का संगम

इस मेले की सबसे खास बात यह है कि ग्रामीण अपने घरों से दूध, दही, मक्खन, चावल, फल और फूल साथ लेकर आते हैं। ये सामग्री किसी आम पूजन के लिए नहीं, बल्कि अपने कुलदेव नागराज और हूण देवता को अर्पित करने के लिए लाई जाती है। ग्रामीण इन दुग्ध उत्पादों से देवताओं का अभिषेक करते हैं। मान्यता है कि इससे देवता प्रसन्न होते हैं और खेती, पशुधन और परिवार की खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं।

ओलगिया संक्रांति और कृतज्ञता की संस्कृति

यह मेला भाद्रपद की संक्रांति, जिसे पहाड़ी क्षेत्रों में ओलगिया उत्सव भी कहा जाता है, के अवसर पर मनाया जाता है। यह पर्व उत्तराखंड में फसल की समृद्धि, पशुओं की सेहत और प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का प्रतीक है। यह पर्व गांव की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ा है।

संस्कृति को चाहिए संरक्षण और सरकारी सहयोग

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि वे इस पौराणिक मेले की परंपरा को पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं और यह उनकी संस्कृति की आत्मा है। लेकिन अब समय आ गया है कि सरकार भी इस तरह के लोक पर्वों को संरक्षण प्रदान करे। ग्रामीणों की मांग है कि “दूध गड्डू मेले” को राज्य सरकार की संस्कृति संरक्षण योजनाओं में शामिल किया जाए।

वे मानते हैं कि अगर सरकार से सहयोग मिले, तो यह मेला न केवल और व्यवस्थित हो सकता है, बल्कि इससे स्थानीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने में मदद मिलेगी।

उत्तरकाशी जैसे पर्वतीय जिलों में ऐसे कई पारंपरिक मेले और त्योहार हैं जो आज भी सरकारी उपेक्षा की स्थिति में हैं। जरूरत है कि राज्य सरकार इन अनदेखे पर्वों को चिह्नित कर उनका दस्तावेजीकरण और संरक्षण करे। ये न सिर्फ हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं, बल्कि स्थानीय पहचान और सामाजिक एकता का मूल आधार भी।