

टॉप देहरादून

सचिन कुमार

उत्तराखंड में बीते पांच वर्षों के दौरान स्कूल शिक्षा विभाग का बजट तो लगभग दोगुना हो गया है, लेकिन इसके विपरीत सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018-19 की तुलना में अब तक करीब 72,000 छात्र सरकारी स्कूलों से बाहर हो चुके हैं।



विशेषज्ञों और शिक्षा से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी संसाधनों की कमी, शिक्षकों की अनुपलब्धता और शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट इसके मुख्य कारण हैं।

विभागीय रिपोर्ट के अनुसार,



वर्ष 2018-19 में प्रति छात्र औसतन ₹56,990 खर्च किया जा रहा था।
2024-25 तक यह खर्च बढ़कर ₹1,15,000 प्रति छात्र तक पहुंच गया है।

इतने बड़े बजट के बावजूद सरकारी स्कूलों की हालत जस की तस है। स्कूल भवनों की मरम्मत, डिजिटल शिक्षा, पुस्तकें, खेल सामग्री और शिक्षकों की ट्रेनिंग के नाम पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हालात नहीं बदल पा रहे हैं।


सरकार ने बनाई जांच समिति, रिपोर्ट अधूरी
छात्रों की गिरती संख्या और बढ़ते शिक्षा बजट की जांच के लिए सरकार ने सात सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। रिपोर्ट में दोनों मुद्दों का उल्लेख तो किया गया, लेकिन बजट का स्पष्ट उपयोग और प्रभावी समाधान सुझाने से समिति चूक गई।

राजनीतिक हमले तेज
इस मुद्दे पर कांग्रेस ने सरकार को घेरा है। पार्टी प्रवक्ता डॉ. प्रतिमा सिंह ने कहा, “जब शिक्षा बजट इतना बढ़ गया है, तो फिर इतनी बड़ी संख्या में छात्र सरकारी स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं?” उन्होंने समिति की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए और कहा कि यह जांच महज एक औपचारिकता बनकर रह गई है।


अब आगे क्या?
शिक्षाविदों का मानना है कि केवल बजट बढ़ाने से शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधर सकती, जब तक संसाधनों का न्यायसंगत उपयोग, शिक्षक प्रशिक्षण और स्कूलों की निगरानी व्यवस्था मजबूत न की जाए। राज्य सरकार के सामने अब यह चुनौती है कि वह छात्रों का विश्वास सरकारी शिक्षा प्रणाली में दोबारा कैसे लौटाए।

यह मामला शिक्षा व्यवस्था की जड़ों में झांकने और दीर्घकालिक सुधारों की जरूरत का संकेत देता है।



