


स्थान-ऋषिकेश

रिपोर्ट-खुशबू गौतम

तीर्थनगरी ऋषिकेश में स्थित पौराणिक सोमेश्वर महादेव मंदिर की तलहटी से बहने वाली रंभा नदी, जो स्कंद पुराण के केदारखंड में उल्लिखित है, आज अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रही है। धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण यह नदी प्रदूषण, प्रशासनिक लापरवाही और अधूरे विकास कार्यों की भेंट चढ़ चुकी है।



झील अधूरी, वादे पूरे नहीं
रंभा नदी के संरक्षण और आसपास पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इसके किनारे संजय झील निर्माण की योजना बनाई गई थी। कार्य की शुरुआत भी हुई, निरीक्षणों की तस्वीरें भी आईं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि झील आज भी अधूरी है। विकास कार्य पूरी तरह ठप हैं और जनता को केवल आश्वासन ही मिले हैं।


ठंडे बस्ते में संरक्षण प्रस्ताव
पूर्व मेयर के कार्यकाल में नगर निगम बोर्ड बैठक में रंभा नदी के संरक्षण को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया था। लेकिन वह प्रस्ताव भी अन्य कागज़ी योजनाओं की तरह सरकारी फाइलों में धूल फांक रहा है। ना तो बजट मिला, ना कार्यवाही हुई।


प्रदूषण की मार और प्रशासनिक लापरवाही
आज की स्थिति यह है कि आईडीपीएल, सर्वहारा नगर, शास्त्री नगर, गीता नगर, शिवाजी नगर, गुमानीवाला और वीरभद्र क्षेत्र का बरसाती पानी और सीवर सीधे रंभा नदी में मिल रहा है। इसके परिणामस्वरूप यह नदी दूषित होकर गंगा में समाहित हो रही है, जो नमामि गंगे जैसी करोड़ों की योजनाओं पर भी सवाल खड़ा करता है।




कानूनों की अनदेखी, पर्यावरण प्रेमियों की पुकार
नदियों की सुरक्षा से जुड़े कानून केवल कागजों तक सीमित हैं। पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय संगठनों द्वारा बार-बार दिए गए ज्ञापन, जनआंदोलन और आग्रह आज तक अनसुने ही रह गए हैं।


पर्यावरण प्रेमी विनोद जुगलान कहते हैं:
“यह पौराणिक धरोहर को बचाने की आखिरी पुकार है। यदि अब भी उपेक्षा जारी रही, तो रंभा केवल धार्मिक ग्रंथों और इतिहास के पन्नों में ही जीवित रहेगी, ज़मीनी हकीकत से नहीं।”

स्थानीय लोगों की मांग
- रंभा नदी से सीवर कनेक्शन हटाए जाएं
- नदी की सफाई और संरक्षण के लिए ठोस योजना बने
- संजय झील निर्माण कार्य शीघ्र पूर्ण हो
- स्थानीय प्रशासन, निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मिलकर ज़िम्मेदारी दी जाए


