


भोटिया और जाड़ समुदाय ने देवस्थलों में की पूजा, रांसो-तांदी नृत्य ने मन मोहा

रिपोर्ट- दीपक नौटियाल
उत्तरकाशी/जादूंग
सीमांत जनपद उत्तरकाशी के भारत-चीन सीमा पर स्थित जादूंग गांव में सोमवार को आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। भोटिया और जाड़ समुदाय के सैकड़ों ग्रामीणों ने अपने पैतृक गांव नेलांग और जादूंग पहुंचकर पारंपरिक विधि-विधान से अपने आराध्य देवताओं की पूजा-अर्चना की।




इस अवसर पर ग्रामीणों ने पारंपरिक रांसो-तांदी नृत्य प्रस्तुत कर संपूर्ण घाटी को भक्ति और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर कर दिया। पांडव चौक और रिंगाली देवी चौक में विशेष पूजा-अर्चना के बाद लाल देवता और रिंगाली देवी की डोलियों की भव्य शोभायात्रा निकाली गई।



पारंपरिक वेशभूषा और गीतों से गूंज उठा सीमांत क्षेत्र
महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सज-धज कर आईं और पौराणिक लोकगीतों के माध्यम से अपने देवताओं का आह्वान किया। घाटी में गूंजते गीतों और घंटियों की ध्वनि ने माहौल को भक्तिमय बना दिया।




सेना ने की विशेष व्यवस्थाएं, आरओ प्लांट का लोकार्पण
इस ऐतिहासिक अवसर पर सीमा पर तैनात आईबैक्स ब्रिगेड और राजपुताना रायफल्स के जवानों और अधिकारियों ने ग्रामीणों के लिए विशेष व्यवस्थाएं कीं। साथ ही आरओ प्लांट का लोकार्पण कर जादूंग गांव को स्वच्छ पेयजल की सौगात दी गई। सेना के अधिकारियों ने भी पूजा में भाग लेकर स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान और सहयोग का भाव दर्शाया।

परंपराएं जिंदा, विस्थापन के बावजूद कायम है आस्था
गौरतलब है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, जादूंग, नेलांग और कारछा गांवों के लोगों को विस्थापित कर बगोरी, डुंडा और हर्षिल क्षेत्रों में बसाया गया था। बावजूद इसके, भोटिया और जाड़ समुदाय हर वर्ष अपने पैतृक गांवों में आकर देवस्थलों की आराधना करते हैं। यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह से जीवित है।




