रामनगर मालधनचौड़: 65 वर्षों से ‘अवैध’ जीवन जीने को मजबूर 600 परिवार, प्रशासनिक रिकॉर्ड पर उठे गंभीर सवाल

रामनगर मालधनचौड़: 65 वर्षों से ‘अवैध’ जीवन जीने को मजबूर 600 परिवार, प्रशासनिक रिकॉर्ड पर उठे गंभीर सवाल

स्थान: रामनगर
सलीम अहमद साहिल

रामनगर के मालधनचौड़ क्षेत्र से एक ऐसी पीड़ादायक हकीकत सामने आई है, जिसने लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। यहां मोहननगर और शिवनाथपुर पुरानी बस्ती के करीब 600 परिवार पिछले 65 वर्षों से जिस जमीन पर रह रहे हैं, उसी पर आज भी उनका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है। तीन पीढ़ियां इसी मिट्टी पर पली-बढ़ीं, लेकिन सरकारी कागजों में ये परिवार आज भी ‘अवैध’ माने जा रहे हैं।

विडंबना यह है कि इन गांवों में स्कूल, सड़क, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं। ग्रामीण दशकों से त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में मतदान कर रहे हैं, उनके पास राशन कार्ड और वोटर आईडी भी है, लेकिन खसरा-खतौनी में उनके घरों और जमीन का नाम तक दर्ज नहीं है। जिन आशियानों में पीढ़ियां गुजर गईं, वे सरकारी रिकॉर्ड में मानो मौजूद ही नहीं हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने कागजी हेराफेरी कर इन आबाद बस्तियों को ‘कृषि योग्य बंजर भूमि’ घोषित कर दिया। फाइलों में चली एक कलम ने सैकड़ों परिवारों के वजूद को ही मिटा दिया। इसका नतीजा यह है कि हजारों लोग अपने ही घरों में रहते हुए भी मालिकाना हक से वंचित हैं।

अपनी पीड़ा लेकर आज ग्रामीण विधायक कार्यालय पहुंचे। आंखों में आंसू और हाथों में दशकों पुराने दस्तावेज थे, जो अब धुंधले पड़ चुके हैं। ग्रामीणों ने बताया कि उनके दादा-परदादा इसी उम्मीद में दुनिया छोड़ गए कि एक दिन उनके परिवार को जमीन का हक मिलेगा, लेकिन आज तीसरी पीढ़ी भी उसी संघर्ष को जीने को मजबूर है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बिना कागजों के ये नागरिक सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गए हैं? क्या प्रशासनिक फाइलों में इन परिवारों के आशियानों का कोई अस्तित्व नहीं है? मालधनचौड़ की यह कहानी न केवल प्रशासनिक लापरवाही, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता को भी उजागर करती है।