25 साल का उत्तराखंड, लेकिन ‘मालिकाना हक़’ अब भी सपना

25 साल का उत्तराखंड, लेकिन ‘मालिकाना हक़’ अब भी सपना

स्थान: रामनगर
संवाददाता: सलीम अहमद साहिल

उत्तराखंड राज्य बने 25 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन कई गाँव आज भी उसी दर्द से गुजर रहे हैं, जहाँ लोगों के सिर पर छत तो है, पर ज़मीन पर मालिकाना हक़ नहीं। सरकारें बदलीं, योजनाएँ आईं, पर इन ग्रामीणों की तक़दीर अब भी नहीं बदली। मालधनचौड़ आठ नम्बर से उठी यही पुरानी पीड़ा अब जनआंदोलन का रूप लेती दिखाई दे रही है।

“युवा राज्य के सीने पर पुरानी पीड़ाओं का बोझ” — यही हकीकत है उस उत्तराखंड की, जो कभी आंदोलन से जन्मा था, और अब फिर एक नए आंदोलन को मजबूर है।

रामनगर विधानसभा के कई गाँव आज भी “वन ग्राम” या “सरकारी भूमि” पर बसे हैं। सिचाई विभाग, राजस्व या वन भूमि पर करीब 60 सालों से रह रहे इन परिवारों की ज़िंदगी आज भी अनिश्चितता में झूल रही है।

वक्त बदला, लेकिन नहीं बदला तो इन ग्रामीणों का मुकद्दर। जब भी प्रशासन ‘अतिक्रमण हटाओ’ की बात करता है, इन बस्तियों में सन्नाटा पसर जाता है। किसी पिता की आंखों में अपने घर के उजड़ने का डर है, तो कोई माँ अपने आंगन की मिट्टी उठाकर दुआ करती है — “अब तो हमें मालिकाना हक़ दे दो।”

अब यही दर्द आवाज़ बन चुका है — ‘मालिकाना हक़ संघर्ष समिति’ की।
मालधनचौड़ आठ नम्बर में आयोजित सभा में बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक ने एक ही मांग उठाई — “अब और इंतज़ार नहीं, हमें मालिकाना हक़ चाहिए।”

सभा में समिति के अध्यक्ष एस. लाल ने कहा — “हम दशकों से यहाँ रह रहे हैं, खेती कर रहे हैं। अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो यह आंदोलन पूरे कुमाऊँ में फैलेगा।”

लोगों ने एक स्वर में कहा कि जो परिवार 50-60 वर्षों से इन ज़मीनों पर रह रहे हैं, उन्हें अब स्थायी अधिकार मिलना चाहिए। संघर्ष समिति ने स्पष्ट ऐलान किया — “हक़ नहीं तो वोट नहीं।”

उत्तराखंड की रजत जयंती पर यह तस्वीर सवाल खड़ी करती है —
राज्य तो बन गया, लेकिन क्या वह हक़ भी मिला, जिसके लिए यह राज्य बना था?

क्योंकि सवाल सिर्फ़ ज़मीन का नहीं है…
सवाल है अधिकार के उस भरोसे का, जिसके इंतज़ार में उत्तराखंड के 25 साल और इन लोगों के जीवन के 60 साल बीत गए।