

हल्द्वानी

बागजाला गांव (गौलापार) में अखिल भारतीय किसान महासभा द्वारा आयोजित चेतावनी रैली की तैयारी के तहत जनसंपर्क अभियान के दौरान पुलिस और किसान नेताओं के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई। रैली की तैयारी के लिए गांव में प्रचार कर रहे किसान महासभा के प्रदेश अध्यक्ष कामरेड आनंद सिंह नेगी, डॉ. कैलाश पांडेय और अन्य कार्यकर्ताओं को पुलिस ने भारी बल बल के साथ आकर रोक दिया।



नेताओं के अनुसार, वे गांव में पेयजल, सड़क और विकास कार्यों की मांग को लेकर आगामी 27 मई को हल्द्वानी के बुधपार्क में आयोजित चेतावनी रैली के लिए पर्चा वितरण और जनसंपर्क कर रहे थे। इस दौरान पुलिस अधिकारियों ने प्रचार रोकने, बैनर हटाने और प्लेकार्ड समेटने के आदेश दिए।


किसान नेताओं का आरोप है कि हल्द्वानी कोतवाल राजेश यादव और सीओ रामनगर के नेतृत्व में आई फोर्स ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा डालते हुए उन्हें धमकाने का प्रयास किया। पुलिस ने कहा कि गांव में किरायेदार सत्यापन अभियान चलाया जा रहा है और इस दौरान कोई प्रचार नहीं किया जा सकता।


कामरेड आनंद सिंह नेगी ने कहा, “जब हमने पर्चा देकर अपनी मांगें स्पष्ट कीं, तो अधिकारियों ने अभद्रता की और धमकाया कि मुकदमा दर्ज करेंगे। यह लोकतंत्र की अवमानना है।”

प्रदर्शनकारी नेताओं ने एसएसपी नैनीताल से सवाल किया है कि क्या जिले में धारा 144 लागू है या पुलिस भाजपा के कैडर की तरह व्यवहार कर रही है। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और एकत्र होने का अधिकार है, जिसे पुलिस बाधित नहीं कर सकती।

किसान महासभा ने एसएसपी से मामले की निष्पक्ष जांच कराकर हल्द्वानी कोतवाल राजेश यादव और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है। साथ ही यह भी मांग की है कि पुलिस आम जन से गरिमापूर्ण और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप व्यवहार करे।

इस घटना ने उत्तराखंड में अभिव्यक्ति की आज़ादी और पुलिस के आचरण पर फिर से बहस छेड़ दी है। क्या आंदोलन से बने इस राज्य में अब शांतिपूर्ण विरोध और जनसंपर्क भी प्रतिबंधित हो चुका है — यह एक बड़ा सवाल बन गया है


