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रिपोर्ट- दीपक नोटियाल

स्थान-उत्तरकाशी

उत्तरकाशी के काशीविश्वनाथ मंदिर के सामने शक्ति माता के मन्दिर मे स्थिति हैत्रिशूल कहा जाता है कि जिस समय आनादी काल मे देव असूर संग्राम सुरू हुवा था उस समय यह त्रिशूल स्वर्ग लोक से अबतरित हुवा है ओर महिषासुर सुर ओर ओर वाणासुर सुर असुरों का संहार इसी त्रीशूल से इतना संहार हुवा है ओर इसके बाद ये त्रिशूल भगवान शेषनाग के शर तक समाया हुवा है स्वर्ग लोग से ये दे निर्मित ओर ये ओर देव स्थापनीय त्रिशूल किस घातू का बना हुवा है ।।


आज तक इसका पता नही चल पाया है एक बार पुरातत्व विभाग ने इसकी खुदाई करने की कोशिश की थी पर 10 मीटर खुदाई के बाद उनके ओजारों ने काम करना बन्द कर दिया था आप देख सकते है कि इस अदभुत त्रीशूल मे कही घातुओ का मिश्रण है पर ये पता नही चल पाया है कि ये कोन सी घातू है परन्तु जो कलस दिखाई दे रहा है वो चोथी शताब्दी का है ओर देव निर्मित है साथ ही इस त्रिशूल की विशेषता यह है कि यह इतना भारी होने के बाद भी केवल अनामिशका से हिलता है बाकी चाहे आप कितना जोर लगायें ये टस से मस नही होगा ओर इसकी मान्यता स्कन्द पुराण के केदार खण्ड मे बर्णित है ।।


