विकास की तलाश कर रहे उत्तराखंड राज्य का चुनावी मूड

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रिपोर्टर- समीक्षा रावत

स्थान- देहरादून

उत्तराखंड 2022 विधानसभा चुनाव नजदीक हैं | उत्तराखंड के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, गोवा, पंजाब और मणिपुर में भी चुनाव होने हैं | वहीं अगर बात करें उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की तो राज्य की 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने हैं | 2017 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद गठित वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 23 मार्च 2022 को समाप्त हो जायेगा |
राज्य में 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 57 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत से अपनी सरकार बनाई थी | वहीं कांग्रेस सिर्फ 11 सीटों पर ही अपना दबदबा दिखा पाई और 2 सीटों में निर्दलीय लड़ रहे विधायक कामयाब रहे | लेकिन उत्तराखंड में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प होने वाले हैं क्योंकि अगर बार करें अब तक की तो राज्य में सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस ही अपना परचम फहराती आ रही है लेकिन अब राज्य के सामने तीसरे विकल्प के रूप में खड़ी आम आदमी पार्टी भी पूरे जोश-खरोश के साथ अपना दबदबा दिखने में जुट गई है |

.21 सालों में राज्य का विकास कहाँ तक पहुंचा


उत्तराखंड को बने हुए पुरे 21 साल हो चुके हैं लेकिन विकास के नाम पर आज तक यहाँ के लोगों के साथ सिर्फ धोखा ही होते नजर आ रहा है | हालाँकि राज्य ने शिक्षा, ऊर्जा, उद्योग, कानून व्यवस्था के क्षेत्र में ऊचाईयां भी हासिल की है लेकिन 21 साल के युवा उत्तराखंड में आज भी पलायन की गति रुकने का नाम नहीं ले रही, राज्य का पर्यावरण संतुलन दिन-ब-दिन सिरे नहीं चढ़ रहा है | इसके अलावा कैग रिपोर्ट की जानकारी के अनुसार राज्य पर 65 हजार रूपए का कर्ज हो चूका है | वहीं रोजगार के अवसर तो राज्य में पूरी तरह से चौपट है, जो पलायन का सबसे कारण है | उत्तराखंड जब एक राज्य बना था तब बेरोजगारों की संख्या 3 लाख थी लेकिन इन 21 सालों में इनकी संख्या 8 से 10 लाख के पार पहुँच चुकी है | साथ ही राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार तो हुआ लेकिन सिर्फ मैदानों में | पहाड़ों की स्थिति आज भी वही है जो 21 साल पहले थी | विकास सिर्फ मैदानों का हुआ पहाड़ आज भी वहीं ठहरा हुआ है | साथ ही राज्य में अब भी यह भी विडंबना है कि उत्तराखंड स्थापना के बीस साल बाद भी अपनी स्थाई राजधानी तलाश रहा है। हर 5 साल में पार्टियां बदलती हैं, नेता बदलते हैं लेकिन एक चीज नहीं बदलती और वह हैं, पहाड़ |

. सरकार की खामियां

एक बार फिर अब राज्य में चुनावी दौर शुरू हो चूका है | नेता आयेंगे और झूठे-जुमले वादे कर जनता को मूर्ख बनायेंगे | 2017 में बीजेपी ने भारी बहुमतों से अपनी सरकार बनाई | त्रिवेंद्र सिंह रावत साल अपने 4 कार्यकाल में तो सोये रहे | वहीं अपनी स्थिति को देख 4 साल में उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया | इस्तीफा देने के बाद तीरथ सिंह रावत को नया मुख्यमंत्री घोषित किया गया लेकिन वह भी कुछ ही महीनों में अपनी कुर्सी छोड़ बैठे | अब राज्य के नए युवा नेता पुष्कर सिंह धामी के सामने भाजपा को जिताने की कमान सौंप दी गई है |

.राज्य सरकार का विकास और खामियां

राज्य में अगर भाजपा के कुछ फैसलों की बात करें तो गढ़वाल के हिस्से गैरसैंण मंडल में कुमाऊं के दो जिलों को शामिल करना, चारधाम यानि बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को सरकारी देवस्थानम बोर्ड के अधीन करना, गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करना और लोगों से कम मिलना।
वहीं देवस्थानम् बोर्ड बनाने का चार धामों और अन्य ब्राह्मणों ने कड़ा विरोध किया था | हालांकि वह सही फैसला था, क्योंकि देश के कई मंदिर ऐसे हैं जो बोर्ड के तहत काम कर रहे हैं। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आगामी चुनाव नजदीक आने पर ब्राह्मणों की नाराजगी को ध्यान में रखते हुए देवस्थानम् बोर्ड को भंग कर दिया ।
चुनाव हर 5 साल में होते हैं लेकिन मुद्दे हर बार वही पुराने | इस बार तो एक और न्य मुद्दा इन पुराने मुद्दों में शामिल हो गया है | वह है, राज्य और केंद्र की सरकार से खफ़ा किसानों का मुद्दा | हालांकि इसका असर राज्य के सिर्फ तीन ही मैदानी इलाकों देहरादून, उधम सिंह नगर और हरिद्वार में ही है लेकिन राज्य की आधी सीटें मैदानी इलाकों में भी पड़ती है और पिछले चुनावों की बात करें तो भाजपा को जिताने में मैदानों का ही ज्यादा योगदान थी | फिर भी सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को हटाकर किसानों की नाराजगी को कम करने का प्रयास तो किया है लेकिन किसानों की नाराजगी आगामी विधानसभा चुनाव के नतीजों के सामने आने पर ही पता चलेंगी |
हालाँकि भाजपा अपने कार्यकाल में कई विकास परियोजनाओं को भी लाई नही | जिनमें से 85,000 करोड़ रुपये की सड़क और रेल बुनियादी ढांचा, केदारनाथ के पुनर्निर्माण के लिए मोदी के विजन के अनुरूप मंदिर और उसके आसपास ऐसे विकास कार्य किए गए जो पहले कभी नहीं देखे गए। साथ ही कई हजार करोड़ की योजनाओं और परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास भाजपा अब तक कर चुकी है | वहीं अपने एक भाषण में अमित शाह ने कहा था कि राज्य की रचना अटल बिहारी बाजपये ने की थी और इसे बनायेंगे मोदी जी |अब यह बात कहाँ तक सच है, यह तो भविष्य ही बता पायेगा |

.कांग्रेस का विकास और खामियां

राज्य के गठन के बाद उत्तराखंड में अंतरिम विधानसभा के 30 सदस्यों में से 17 विधायक भाजपा के थे, तो सरकार बनाने का मौका भी भाजपा को ही दिया गया लेकिन 2002 में जब पहली बार चुनाव हुए तो राज्य की जनता ने कमान कांग्रेस को सौंप दी | 36 सीटों पर बहुमत बनाकर कांग्रेस ने एनडी तिवारी को मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया | इसके बाद से ही राज्य की जनता कांग्रेस और भाजपा दोनों को सत्ता में आने का मौका देती रहती है | लेकिन कांग्रेस का बुरा वक्त तब शुरू हुआ जब 2017 के चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 11 ही सीटों सिमट गई | इस वक्त पार्टी भले ही बुरे वक्त से गुजर रही हो लेकिन पार्टी के नेताओं का कहना है कि जनता ने मोदी के जूनून में आकर बहक गई थी लेकिन अब ऐसा नहीं होगा और आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस ही जीतेगी और राज्य में एक बार फिर अपनी सरकार बनाएगी | वहीं कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस बार तो पार्टी के पास रोजगार, भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे तमाम बड़े मुद्दें है जिनसे वह आसानी से जीत हासिल कर सकती है | अब देखना यह होगा कि उनके यह मुद्दें उन्हें जीत दिलाने में काम आते भी हैं या नहीं |एक बार फिर से राज्य में अपनी सरकार बनाने के कांग्रेस पूरी तरह हाथ-पैर मार रही है | अब राज्य की सत्ता की बागदौड़ किसके हाथों में होगी, यह तो चुनावी परिणाम ही बता पाएंगे |

.तीसरे विकल्प के रूप में खड़ी “आप”

उत्तराखंड की जनता के सामने इस बार बार तीसरे विकल्प के रूप में खड़ी आम आदमी पार्टी भी राज्य में अपनी जगह बनाने की पूरी तैयारियां कर रही है | आम आदमी पार्टी इस बार 70 विधानसभा सीटों पर बिना किसी गठबंधन के चुनाव लड़ रही है | जिसके लिए आम आदमी पार्टी ने तकरीबन 42 विधानसभा प्रभारियों की नियुक्ति भी कर दी है | राज्य में लगातार दौरों के साथ-साथ वह अपनी घोषणाओं से जनता को अपनी ओर करने का काम कर रही है | मुफ्त बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जैसे मुद्दों के साथ आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड में अपने कदम रखें हैं |लेकिन आप भी राज्य में आकर सुविधा की ही राजनीती करना चाहती है | उत्तराखंड के तेरह जिलों में से असल समस्या सुदूर नौ पहाड़ी जिलों की है जहाँ आम आदमी पार्टी को इन दुर्गम अंचलों से कोई सरोकार नहीं दिखता | आप ने साफ छवि के कर्नल अजय कोठियाल को भले ही मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया हो लेकिन कोठियाल को कोई नेता मानने को तैयार नहीं है नतीजतन आप मुकाबले में कहीं है ही नहीं | राज्य की जनता को अब यही लग रहा है कि नाममात्र के लिए चुनाव लड़ने और वोट काटने तक ही इस बार के चुनाव में आप का ताना-बाना सीमित रहेगा | विपक्षी दलों का तो मानना है कि आप सरकार बनाना तो दूर एक सीट पर भी अपनी जीत दिखाए | अब देखना है कि क्या आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा को पछाड़ पायेगी या फिर खुद ही इतिहास के पन्नों में पिछड़ जाएगी |

देवभूमि और पहाड़ी राज्य कहे जाने वाले उत्तराखंड के आसन्न विधानसभा चुनाव में दिलचस्पी का पहला मुद्दा तो यही है कि क्या एक बार फिर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी फिर से सत्ता में लौट सकेगी? क्योंकि 21 साल पुराने इस राज्य में हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन का इतिहास है। न केवल सत्ता परिवर्तन बल्कि एक ही पार्टी की सरकार में मुख्यमंत्री बदले जाने का रिकॉर्ड भी। उत्तराखंड की पहाड़ी जनता आज भी विकास की राह देख रही है लेकिन शायद उनकी आँखें बूढी हो जाएँगी पर विकास पहाड़ तक नहीं पहुँच पायेगा | अब उत्तराखंड का चुनावी मूड जो भी हो लेकिन राज्य में जब तक सकारात्मक राजनीति नहीं होगी, तब तक राज्य का विकास नहीं हो सकता |