
स्थान : पौड़ी
रिपोर्टर : विनोद पांडे


6 सितंबर 1932 का दिन पौड़ी और उत्तराखंड के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में साहस और देशभक्ति की एक यादगार घटना के रूप में दर्ज है। अंग्रेजी शासन के दौर में पौड़ी में लाट मैलकम का दरबार लगा था। प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे और स्पष्ट आदेश था कि ऐसा कुछ न हो, जिससे लाट साहब की शान में किसी तरह की गुस्ताखी मानी जाए।


दरबार के लिए एक छोटा मंच बनाया गया था, जहां लाट मैलकम के स्वागत में अभिनंदन पत्र पढ़ा जा रहा था। सभा में मौजूद लोगों पर पुलिस और प्रशासन की निगाह थी। इसी बीच सभा की पहली पंक्ति में बैठे स्वतंत्रता सेनानी जयानंद भारती अपने कुर्ते की आस्तीन में तिरंगा छिपाकर सही अवसर का इंतजार कर रहे थे।



जयानंद भारती को तिरंगा फहराने के लिए केवल एक डंडे की जरूरत थी। सभा में मौजूद उनके साथियों ने बड़ी सावधानी से एक डंडा उनकी ओर सरकाना शुरू किया। जब तक लाट मैलकम का अभिनंदन पत्र पूरा हुआ, तब तक डंडा जयानंद भारती के पास पहुंच चुका था और उन्होंने उस पर तिरंगा चढ़ाना शुरू कर दिया।



जैसे ही लाट मैलकम भाषण देने के लिए खड़े हुए, जयानंद भारती भी पूरी फुर्ती के साथ अपनी जगह से उठे। हाथ में तिरंगा लेकर वह मंच की ओर बढ़े और अंग्रेजी शासन के खिलाफ जोरदार नारे लगाने लगे। पूरे दरबार में ‘गो बैक मैलकम हेली’, ‘भारत माता की जय’, ‘अमन सभा मुर्दाबाद’ और ‘कांग्रेस जिंदाबाद’ के नारों की गूंज सुनाई देने लगी।


अचानक हुई इस घटना से वहां मौजूद अंग्रेज अधिकारी और पुलिसकर्मी सकते में आ गए। जयानंद भारती मंच तक पहुंच पाते, इससे पहले ही पुलिस ने उन्हें रोक लिया और लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। इसके बावजूद भारती के नारे बंद नहीं हुए। उन पर जितनी लाठियां बरसती गईं, उतनी ही बुलंद आवाज में वह आजादी के नारे लगाते रहे।
बताया जाता है कि जयानंद भारती की आवाज को रोकने के लिए तत्कालीन इलाका हाकिम ने उनके मुंह में जबरन रुमाल ठूंस दिया। पुलिस ने उनके हाथ से तिरंगा छीनकर फाड़ दिया। घटना के बाद लाट मैलकम हेली को कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच वहां से डाक बंगले की ओर ले जाया गया।



इस ऐतिहासिक विरोध की तैयारी अचानक नहीं हुई थी। जयानंद भारती तिरंगा फहराने के उद्देश्य से एक रात पहले ही पौड़ी पहुंच गए थे। बताया जाता है कि उन्होंने कोतवाल सिंह नेगी वकील के घर पर तीन अलग-अलग रंगों के कपड़ों के टुकड़ों को सिलकर स्वयं तिरंगा तैयार किया था। अगले दिन उसी तिरंगे के साथ उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के दरबार में विरोध का साहस दिखाया।

घटना के तुरंत बाद जयानंद भारती को हथकड़ी लगाकर पौड़ी जेल ले जाया गया। उनकी गिरफ्तारी की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में लोग उनके पीछे चल पड़े। आगे हथकड़ी पहने जयानंद भारती और पीछे जनता का हुजूम था। आखिरकार भारती ने स्वयं लोगों से अपने-अपने घर लौटने का अनुरोध किया, जिसके बाद भीड़ वापस हुई।
जयानंद भारती की यह घटना पौड़ी में ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण स्मृति बन गई। गिरफ्तारी के बाद उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा और 28 सितंबर 1933 को वह जेल से रिहा हुए। पौड़ी के दरबार में तिरंगा लेकर अंग्रेजी सत्ता को दी गई उनकी चुनौती आज भी स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर के साहस, संघर्ष और राष्ट्रप्रेम की कहानी को याद दिलाती है।

