
स्थान : भुजियाघाट
रिपोर्टर : पंकज सक्सेना


सूर्यागांव क्षेत्र में स्थित गोल्डन फन पार्क में कथित रूप से कृषि भूमि पर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित किए जाने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। पूर्व में शिकायतों और खबर प्रकाशित होने के बाद प्रशासन ने मौके पर कार्रवाई करते हुए कथित अवैध निर्माण को सील कर काम बंद कराया था। अब आरोप है कि सीलिंग की कार्रवाई के बावजूद संबंधित स्थान पर दोबारा व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।


मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठाया जा रहा है कि प्रशासन की ओर से एक बार निर्माण सील किए जाने के बाद वहां गतिविधियां दोबारा कैसे शुरू हो गईं। यदि भूमि का उपयोग कृषि प्रयोजन के लिए निर्धारित है तो उस पर व्यावसायिक गतिविधि किन अनुमतियों के आधार पर संचालित की जा रही है, इसकी जांच और स्थिति स्पष्ट करने की मांग की जा रही है।




पूर्व में संबंधित उप जिलाधिकारी की ओर से पट्टा निरस्तीकरण से संबंधित प्रस्ताव जिलाधिकारी को भेजे जाने की बात कही गई थी। आरोप है कि इस प्रक्रिया को करीब आठ महीने बीतने के बावजूद पट्टा निरस्तीकरण पर अंतिम कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि प्रकरण पर निर्णय लेने में इतना समय क्यों लग रहा है।


स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि प्रशासन को कृषि भूमि पर कथित व्यावसायिक गतिविधियों के संबंध में लगातार अवगत कराया गया, लेकिन प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित विभागों को नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए और यदि गतिविधियां वैध हैं तो उनकी अनुमति से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।



वहीं, पार्क में इस्तेमाल किए जा रहे पानी के स्रोत को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि पास से बहने वाले गधेरे से मोटर के माध्यम से पानी लेकर स्विमिंग पूल में डाला जाता है। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में संबंधित विभाग से पानी के स्रोत और उसके उपयोग की वैधानिक अनुमति की जांच की मांग की जा रही है।
मामले में स्थानीय राजस्व तंत्र की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि जिस स्थान पर कथित निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियां हो रही हैं, उससे कुछ ही दूरी पर क्षेत्रीय पटवारी का कार्यालय है। पूर्व में सीलिंग की कार्रवाई में राजस्व विभाग की भूमिका होने की बात भी कही जा रही है। ऐसे में दोबारा निर्माण या गतिविधियां शुरू होने की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंची या नहीं, यह जांच का विषय है।




शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पूर्व में सील किए गए स्थान पर बाद में पुनः निर्माण कर गेट भी बनाया गया। यदि ऐसा हुआ है तो यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि निर्माण किस अनुमति के आधार पर किया गया और क्या सीलिंग हटाने के लिए सक्षम अधिकारी से विधिवत आदेश प्राप्त किया गया था। प्रशासनिक रिकॉर्ड की जांच से ही इसकी वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

इस पूरे प्रकरण ने कृषि भूमि के व्यावसायिक उपयोग, सरकारी अथवा पट्टे की भूमि की निगरानी और प्रशासनिक कार्रवाई की प्रभावशीलता को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। पट्टा निरस्तीकरण का प्रस्ताव यदि वास्तव में भेजा जा चुका है तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है और उस पर अंतिम निर्णय कब तक होगा, इस पर प्रशासन से स्पष्ट जवाब की अपेक्षा है।

अब निगाह प्रशासन और राजस्व विभाग की अगली कार्रवाई पर है। मामले में भूमि की प्रकृति, स्वामित्व अथवा पट्टे की स्थिति, व्यावसायिक उपयोग की अनुमति, पूर्व में की गई सीलिंग, वर्तमान निर्माण और पानी के स्रोत की संयुक्त जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। संबंधित पार्क प्रबंधन का पक्ष भी सामने आना आवश्यक है, ताकि पूरे मामले में दोनों पक्षों के तथ्यों के आधार पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

