रामनगर के वन ग्रामों में 25 हजार वोटरों की लड़ाई: मालिकाना हक के लिए संघर्ष अदालत और सड़कों तक पहुंचा

रामनगर के वन ग्रामों में 25 हजार वोटरों की लड़ाई: मालिकाना हक के लिए संघर्ष अदालत और सड़कों तक पहुंचा

स्थान : रामनगर
संवाददाता : सलीम अहमद साहिल

क्या किसी की किस्मत सिर्फ इसलिए अधूरी रह सकती है क्योंकि वो मिट्टी के घरों में रहता है? रामनगर के 25 हजार वोटरों के लिए यही सवाल दशकों से उनकी जिंदगी में अंधेरा बनकर मंडरा रहा है। वन ग्रामों और खत्तों में कच्ची दीवारों और फूस की छतों के नीचे पीढ़ियां गुज़र गईं, लेकिन हाथ जोड़ते-बुजुर्गों की आशाओं पर ‘अवैध’ होने का डर लगातार साया डालता रहा।

इन ग्रामीणों के वोटों से चुने हुए प्रतिनिधि विधानसभा और संसद की कुर्सियों तक पहुंचते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही इन्हें अपनी ही जमीन पर बेदखली का डर सताता है। दशकों से ये लोग अपने आंगन में शरणार्थियों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं, और कारण सिर्फ इतना है कि अशिक्षा और सिस्टम ने उन्हें संवैधानिक अधिकारों से दूर रखा।

वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत ये लोग अपनी जमीन पर मालिकाना हक पाने के पात्र थे, लेकिन सरकारी उदासीनता और जागरूकता की कमी ने इन अधिकारों को लोगों तक पहुँचने ही नहीं दिया। इस अधिनियम के बावजूद वन विभाग और राज्य सरकार ने ग्रामीणों को उनके हक से महरूम रखा, जिससे शोषण का रास्ता खुला रहा।

अब इस अंधेरे में उम्मीद की एक मशाल जली है। अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने इन ग्रामीणों की लड़ाई को उत्तराखंड हाईकोर्ट के पटल पर रखा। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वन विभाग और राज्य सरकार ने जानबूझकर वन अधिकार अधिनियम की जानकारी ग्रामीणों तक नहीं पहुँचाई।

रामनगर की यह जनता अब चुप नहीं बैठने वाली। 25 हजार वोटों की ताकत सड़क से लेकर अदालत तक अपने हक की लड़ाई लड़ रही है। हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी ने साफ कर दिया कि सरकार और वन विभाग ने इस लंबे समय तक ग्रामीणों को उनके अधिकारों से वंचित रखा।

ग्रामीणों ने चेतावनी दे दी है कि अगर इस बार उन्हें हक नहीं मिला, तो उनका वोट सत्ता को आईना दिखाने का काम करेगा। इस बार लड़ाई केवल मालिकाना हक की नहीं, बल्कि न्याय और लोकतंत्र की भी है।

रामनगर की यह जंग अब इंसाफ और सियासत के बीच निर्णायक मोड़ पर है। अब देखना यह है कि सत्ता की दहलीज तक पहुंचने वाले नेता इस पीड़ा और उम्मीद को समझ पाएंगे या नहीं।