
स्थान – बागेश्वर
ब्यूरो रिपोर्ट

जनवरी की कड़ाके की ठंड में जब सरयू के तट पर राजनीतिक गरमाहट महसूस होती है, तब उत्तरायणी केवल एक धार्मिक मेला नहीं रह जाती। यह वह अवसर होता है, जब कुमाऊँ की आत्मा, उसका गौरवशाली इतिहास और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक चेतना एक साथ जीवंत हो उठते हैं। उत्तरायणी वह पर्व है, जहां आस्था की डोर इतिहास और सियासत से जुड़ जाती है।


मकर संक्रांति के पावन अवसर पर सरयू नदी के तट पर हजारों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि इस दिन गंगा व सरयू स्नान और दान-पुण्य से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। दूर-दराज के गांवों से लोग बागेश्वर पहुंचकर उत्तरायणी मेले में शामिल होते हैं और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ पर्व मनाते हैं।


हालांकि उत्तरायणी का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इसका ऐतिहासिक और सामाजिक पक्ष भी उतना ही सशक्त है। वर्ष 1921 में इसी उत्तरायणी मेले ने देश के इतिहास की दिशा बदल दी थी, जब ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहाड़ के लोगों ने यहीं से एक बड़े जनआंदोलन की शुरुआत की।


ब्रिटिश हुकूमत द्वारा थोपी गई अमानवीय ‘कुली बेगार’ प्रथा के विरोध में पहाड़वासियों ने सरयू तट से आवाज बुलंद की। उस दौर में जब संचार के साधन सीमित थे, तब उत्तरायणी मेला ही जनसंवाद का सबसे बड़ा मंच था। लोगों ने अपने औजार त्याग कर अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी और संगठित संघर्ष के माध्यम से कुली बेगार प्रथा का अंत कराया।
यही कारण है कि उत्तरायणी केवल श्रद्धा का पर्व नहीं, बल्कि जनचेतना और संघर्ष का प्रतीक भी है। आज भी इस मेले का राजनीतिक और सामाजिक स्वरूप पूरी तरह जीवंत है। सरयू बगड़ में विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के पंडाल सजे नजर आते हैं।
कांग्रेस, भाजपा, उक्रांद सहित कई राजनीतिक दलों के नेता यहां पहुंचकर जनता से सीधे संवाद करते हैं। जनसमस्याओं, क्षेत्रीय मुद्दों और राजनीतिक विचारधाराओं पर खुली चर्चा होती है, जिससे उत्तरायणी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का भी मंच बन जाती है।

मेले के दौरान लोकसंस्कृति, पारंपरिक गीत-संगीत और स्थानीय उत्पादों की रौनक भी देखते ही बनती है। यह मेला पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी माध्यम है।
कुल मिलाकर उत्तरायणी मेला आस्था, इतिहास और लोकतंत्र का ऐसा अद्भुत संगम है, जहां परंपरा भी है, सवाल भी हैं और संवाद भी। यही वजह है कि हर साल सरयू के तट पर उत्तरायणी केवल एक मेला नहीं, बल्कि एक सशक्त संदेश बनकर उभरती है।

