


रिपोर्ट : दीपक नौटियाल
स्थान : उत्तरकाशी


जनपद उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र में हाल ही में आई भीषण आपदा ने न केवल धराली को बर्बाद किया है, बल्कि वाइब्रेंट विलेज योजना से जुड़े सात गांवों की आजीविका को भी संकट में डाल दिया है। आपदा का असर पूरे टकनौर क्षेत्र में साफ दिखाई दे रहा है, जहां अब ग्रामीणों के सामने सेब और राजमा की खड़ी फसल को मंडियों तक पहुंचाने की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है।



ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान में चारधाम यात्रा सीमित रूप से ही संचालित हो रही है, ऐसे में बाहरी आवाजाही और परिवहन बेहद बाधित है। इसी दौरान अगले कुछ दिनों में सेब की तुड़ाई (तोड़ाई) शुरू हो जाएगी। यदि तब तक सड़क मार्ग नहीं खुला, तो पूरी फसल बर्बाद होने का खतरा है।


सेब की बर्बादी = जीवन यापन पर संकट
धराली और आसपास के गांवों में सेब और राजमा जैसे उत्पाद ही लोगों की मुख्य आजीविका हैं। ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि 2013 की केदारनाथ आपदा की तरह इस बार भी सरकार किसानों से सीधी खरीदारी की व्यवस्था करे, ताकि फसलें बर्बाद न हों और उन्हें उचित मूल्य मिल सके।



प्रशासन ने दवाई भेजी, प्रस्ताव पर विचार का भरोसा
इस संबंध में ज़िलाधिकारी उत्तरकाशी ने बताया कि सेब की फसल पर छिड़काव के लिए आवश्यक दवाइयां हर्षिल भेज दी गई हैं, जिससे फसल को बीमारी से बचाया जा सके। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि ग्रामीणों की ओर से सेब की सीधी खरीद का कोई औपचारिक प्रस्ताव आता है, तो उस पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।


कृषक समुदाय में बढ़ती चिंता
धराली, हर्षिल, मुखवा, जसपुर, चिरबटिया, पुराली और सुंई सहित आसपास के गांवों के किसान वर्तमान हालात को लेकर बेहद चिंतित हैं। उनका कहना है कि यदि जल्दी राहत और परिवहन की व्यवस्था नहीं हुई, तो इस साल की मेहनत और आमदनी दोनों डूब जाएंगी।


यह आपदा केवल एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे पर्वतीय कृषक समुदाय के भविष्य से जुड़ा सवाल बन चुकी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर राज्य की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर भी पड़ेगा।




