

AIADMK में फ्लोर टेस्ट के बाद गहरी टूट सामने आने से तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार ने विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया, जिसके बाद विपक्षी खेमे में हलचल तेज हो गई है।



फ्लोर टेस्ट में सरकार को 144 विधायकों का समर्थन मिला, जबकि विपक्ष में केवल 22 वोट पड़े। इनमें AIADMK के ही एक धड़े के विधायक शामिल बताए जा रहे हैं। वहीं इसी पार्टी के 25 विधायकों ने सीधे विजय के समर्थन में मतदान किया, जिससे पार्टी में आंतरिक विभाजन स्पष्ट हो गया।


विपक्षी दल ने इस शक्ति परीक्षण के दौरान वॉकआउट कर दिया, जिससे सदन में राजनीतिक तनाव और बढ़ गया। चुनाव परिणामों के बाद पहले से ही कमजोर मानी जा रही AIADMK अब दो प्रमुख गुटों में बंटती नजर आ रही है।


AIADMK के एक धड़े ने एडप्पाडी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए बगावत का रुख अपनाया है। वहीं दूसरे धड़े ने एसपी वेलुमणि को विधायक दल का नेता बनाने की मांग उठाई है।

सीवी षणमुगम के नेतृत्व वाले गुट ने दावा किया है कि उनके साथ करीब 25 से 30 विधायक हैं, जो मुख्यमंत्री विजय की पार्टी टीवीके को बाहर से समर्थन देने के पक्ष में हैं। हालांकि यह संख्या पार्टी के भीतर पूर्ण विभाजन साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा रही।

राजनीतिक समीकरणों में यह भी देखा जा रहा है कि कांग्रेस और वीसीके ने डीएमके गठबंधन छोड़कर टीवीके को समर्थन देने का संकेत दिया है, जिससे द्रविड़ राजनीति में नया ध्रुवीकरण उभरता दिख रहा है।

DMK की ओर से इन दावों को खारिज करते हुए इसे आंतरिक पार्टी विवाद का परिणाम बताया गया है। डीएमके नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ राजनीतिक भ्रम और अंदरूनी खींचतान है।


विशेषज्ञों का मानना है कि 1972 में एम.जी. रामचंद्रन द्वारा स्थापित AIADMK अब अपने सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। जयललिता के निधन के बाद से पार्टी में नेतृत्व संकट लगातार गहराता गया है, जिसका असर अब खुलकर सामने आ रहा है।
TVK के उभार और मुख्यमंत्री विजय के बढ़ते प्रभाव ने राज्य की राजनीति में नया ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है। माना जा रहा है कि AIADMK के टूटे हिस्से का झुकाव भी टीवीके की ओर बढ़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव आने वाले समय में तमिलनाडु में दो बड़े राजनीतिक ध्रुवों—डीएमके और टीवीके—के बीच सीधी टक्कर का रास्ता तैयार कर सकता है। वहीं AIADMK की भूमिका कमजोर होकर सीमित होती नजर आ रही है।
फिलहाल तमिलनाडु की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां हर दल अपने अस्तित्व और भविष्य की रणनीति को लेकर पुनर्विचार कर रहा है।

