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रिपोर्टर- दीपक नोटियाल

स्थान- उत्तरकाशी

पारिस्थितिकी तंत्र का सामंजस्य एवं संतुलन बनाकर गंगा एक जीवंत नदी के रूप में अपने अस्तित्व को संभाले हुए है। गंगा नदी में जलीय जीवों की अनेकों प्रजातियां तथा जलीय पौधे पाये जाते हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत एवं आदर्श जैव विविधता को बनाये रखने में अपना सहयोग प्रदान करते हैं। गंगा नदी में कई दुर्लभ प्रजातियां मिलती हैं जैसे- हमारी राष्ट्रीय जलीय जीव गांगेय डॉल्फिन, गंगा शार्क, ऊदबिलाऊ की तीन प्रजातियां (यूरेशियन आॅटर, स्मूथ कोटेड आॅटर तथा स्माल क्लाड आॅटर),कछुए की 14 प्रजातियां जिसमें बटागुर बस्का, बतागर कछुगा, बतागुर घोंगोका, पंगशुरा टैंटौरिया, पंगशुरा स्मिथि, पंगशुरा टेक्टा, हार्डेला थुर्म, मोरेईना पीटरसी, हेमिल्टोनाई टेरापिन, मेलानोशेलिस त्रिजुगा, लेसिमस पंकटाडा, चित्रा इंडिका, निल्सोनिया गेंजेटिका, निल्सोनिया हुजूम हैं।

गंगा घाटी में स्थित इलाकों में बारासिंगा, सांभर, चीतल, बाघ, भेड़िया, लकड़बग्गा, तेंदुआ, नीलगाय और लोमड़ी जैसी प्रजातियों का घर है। भागीरथी में पायी जाने वाली स्नो ट्राउट मछली (स्किजोथोरैक्स रिचर्डसोनी) के साथ गंगा प्रणाली में रोहू, मृगल, गोल्डेन महासीर, हिल्सा, कालबसु, गूंच, कातला सहित सैकड़ों मत्स्य प्रजातियों सहित तमाम तरह के पक्षी और दूसरे जीवजंतु भी रहते हैं। लेकिन विकास की इस प्रक्रिया में गंगा को काफी नुकसान हुआ है, खासकर वनोन्मूलन, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, रासायनिक और जैविक प्रदूषण जैसे कारकों के चलते गंगा की धारा में पलने वाले जीव-जंतुओं को खतरा पैदा हो गया है। घड़ियाल को उनकी खाल से बैग बनाने के लिए मार दिया जाता है। इसी तरह नरम त्वचा वाले कछुओं को समाज के संभ्रान्त वर्ग के लोगों के भोजन के लिए मारा जाता है। जबकि यही कछुए कचरा और जैविक अवशेष को खाते हैं जो नदी को स्वच्छ रखने में मदद करते हैं।


गंगा नदी से प्रवासी पक्षियों का शिकार भी एक वजह है। इसके अलावा नदी में चलने वाली बड़ी नौकाएं भी जलीय जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाती हैं। अक्सर इन नौकाओं से डॉल्फिन टकरा जाती हैं। दरअसल डॉल्फिन को दिखाई नहीं देता, वे आवाज के सहारे अपनी गतिविधियां पूरी करती हैं। बांध और बैराज बनने से भी गंगा में जलीय जीव जंतुओं को खतरा पैदा हुआ है। गंगा में रहने वाले जलचरों को सबसे ज्यादा नुकसान रासायनिक प्रदूषण से हुआ है। गंगा धारा में हर साल करीब 15 लाख मीट्रिक टन रासायनिक खाद और तकनीकी ग्रेड के कीटनाशक हर साल गंगा में प्रवाहित होते हैं।


गंगा के अवसाद में डीडीटी और पारा जैसी भारी धातुएं भी देखी गयी हैं। ये रसायन इतने खतरनाक हैं कि इनसे कैंसर होने का खतरा होता है।इसके अलावा नदी के आसपास खनन तथा अन्य गतिविधियों के चलते भी जलीय जीव जंतुओं को नुकसान हो रहा है। इसलिए अब वक्त आ गया है कि हमें गंगा को निर्मल बनाने का प्रयास करना चाहिए ताकि उसकी गोद में पलने वाले जीव जंतुओं को बचाया जा सके। इसके लिए गंगा विश्व धरोहर मंच की ओर से जल साक्षरता के माध्यम से व नदी के तटीय क्षेत्रों में हर्बल गार्डन स्थापित किये जाने का प्रयास जारी है।


