
स्थान : मसुरी
ब्योरो रिपोर्ट


2 सितंबर 1994 उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास का वह काला दिन है, जिसे मसूरी आज भी नहीं भूल पाई है। पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे लोगों पर पुलिस और पीएसी की गोलीबारी में छह आंदोलनकारियों की मौत हुई थी। इनमें दो महिलाएं भी शामिल थीं। घटना के दौरान तत्कालीन सीओ उमाकांत त्रिपाठी की भी मौत हुई थी। गोलीकांड की 32वीं बरसी पर बुधवार को शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी।


राज्य आंदोलनकारी अनिल गोदियाल के अनुसार, 1 सितंबर 1994 को खटीमा गोलीकांड के बाद मसूरी में भी आक्रोश था। दो सितंबर को आंदोलनकारी खटीमा घटना के विरोध में जुलूस निकालकर उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति के झूलाघर स्थित कार्यालय की ओर बढ़ रहे थे। इसी दौरान गनहिल की ओर से पथराव के बाद भगदड़ जैसी स्थिति बनी और इसके बाद पुलिस व पीएसी की ओर से गोलीबारी शुरू हो गई।


गोलीकांड में मदनमोहन ममगाईं, हंसा धनाई, बेलमती चौहान, बलबीर सिंह नेगी, धनपत सिंह और राय सिंह बंगारी शहीद हुए। वहीं सेंट मैरी अस्पताल के बाहर तत्कालीन सीओ उमाकांत त्रिपाठी की भी मौत हुई थी। घटना के बाद बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया। आंदोलनकारियों के अनुसार करीब 46 लोगों को बरेली सेंट्रल जेल भेजा गया और कई लोगों को लंबे समय तक मुकदमों का सामना करना पड़ा।


गोलीकांड के प्रत्यक्षदर्शी और आंदोलनकारी आज भी उस दिन को याद कर भावुक हो जाते हैं। उनका कहना है कि आंदोलन का उद्देश्य केवल अलग राज्य का गठन नहीं था, बल्कि पहाड़ के लोगों को रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और सम्मान के साथ जीवन देने तथा पलायन रोकने की उम्मीद भी इससे जुड़ी थी।


आंदोलनकारियों का कहना है कि 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य बनना उनके लंबे संघर्ष की बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन राज्य गठन के 26 साल बाद भी पहाड़ की कई मूल समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। उनका दावा है कि अब भी कई आंदोलनकारियों का राज्य आंदोलनकारी के रूप में चिह्नीकरण नहीं हो पाया है और कई परिवार सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

आंदोलनकारियों के अनुसार, आंदोलन के दौरान घायल हुए कई साथी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके परिवारों को अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं। उनका कहना है कि केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करने के बजाय सरकार को शहीद परिवारों और आंदोलनकारियों की लंबित समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।


आंदोलनकारियों की एक प्रमुख मांग यह भी है कि गोलीकांड में जान गंवाने वाले तत्कालीन सीओ उमाकांत त्रिपाठी को भी शहीद का दर्जा दिया जाए। उनका कहना है कि गोलीकांड में उनकी भी जान गई थी और इस पहलू को गंभीरता से देखते हुए उन्हें उचित सम्मान दिया जाना चाहिए।


आंदोलनकारियों का कहना है कि अलग राज्य बनने के बावजूद पलायन आज भी पहाड़ की बड़ी चुनौती है। हालांकि राज्य में सड़क, संचार, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ है और सरकार की ओर से स्वरोजगार व पलायन रोकने की योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन उनका मानना है कि विकास का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि उसका लाभ पहाड़ के अंतिम गांव और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। उनका सपना ऐसा उत्तराखंड बनाने का था, जहां पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ के काम आए और युवाओं को रोजगार के लिए मजबूरन पलायन न करना पड़े।

