
स्थान – नैनीताल / हल्द्वानी
ब्यूरो रिपोर्ट


भुजियाघाट-नैनीताल रोड स्थित सूर्यगांव में बने गोल्ड वाटर पार्क को लेकर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि लीज की जमीन पर संचालित इस वाटर पार्क में कृषि भूमि का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। मामले में उपजिलाधिकारी नैनीताल की ओर से पट्टा निरस्त करने की रिपोर्ट जिलाधिकारी को भेजे जाने के बावजूद करीब सात माह बाद भी पट्टा निरस्त नहीं हुआ है।


बताया जा रहा है कि वाटर पार्क के लिए ली गई जमीन में एक पट्टा कृषि भूमि के रूप में दर्ज है। नियमानुसार ऐसी भूमि का उपयोग कृषि से जुड़े कार्यों के लिए किया जा सकता है। आरोप है कि कृषि भूमि पर निर्धारित कार्यों के बजाय वहां व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं और वाटर पार्क के लिए निर्माण भी कराया गया।


मामले में सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक स्तर पर लंबित पट्टा निरस्तीकरण को लेकर उठ रहा है। जानकारी के मुताबिक उपजिलाधिकारी नैनीताल ने कृषि पट्टे को निरस्त किए जाने संबंधी रिपोर्ट तैयार कर जिलाधिकारी को भेजी थी। इसके बावजूद सात माह बीत जाने के बाद भी पट्टे के संबंध में अंतिम कार्रवाई नहीं होने से प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

इससे पहले भी गोल्ड वाटर पार्क में निर्माण को लेकर विवाद सामने आ चुका है। लगातार शिकायतों और खबरों के प्रकाशन के बाद प्रशासन की कार्रवाई में कृषि भूमि पर किए गए कथित अवैध निर्माण को ध्वस्त किया गया था। इसके बाद उपजिलाधिकारी के आदेश पर संबंधित निर्माण को सील किए जाने की कार्रवाई भी की गई थी।


हालांकि, इसके बाद सील किए गए निर्माण को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि प्रशासन की ओर से सील किए जाने के बाद सील को किसके आदेश पर खोला गया और निर्माण को दोबारा किस स्तर पर ध्वस्त किया गया, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करने की मांग उठ रही है।
स्थानीय स्तर पर यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि जब उपजिलाधिकारी की ओर से पट्टा निरस्तीकरण की रिपोर्ट भेजी जा चुकी थी तो संबंधित भूमि पर व्यावसायिक गतिविधियां किस आधार पर जारी रहीं। लोगों का आरोप है कि यदि भूमि का उपयोग निर्धारित शर्तों के विपरीत किया जा रहा था तो प्रशासन को समय रहते प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए थी।


भुजियाघाट और सूर्यगांव क्षेत्र में केवल गोल्ड वाटर पार्क ही नहीं, बल्कि अन्य निर्माणों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि कृषि उपयोग के लिए दिए गए पट्टों पर होटल, रेस्टोरेंट और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े निर्माण किए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि इन निर्माणों की निगरानी और जांच के लिए जिम्मेदार विभागों की ओर से क्या कार्रवाई की जा रही है।

स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि कृषि भूमि के व्यावसायिक इस्तेमाल की अनुमति नहीं है तो नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए। उनका आरोप है कि लगातार शिकायतों और मीडिया में मामला सामने आने के बावजूद यदि कार्रवाई लंबित रहती है तो इससे प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब पूरे मामले में प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजर है। खास तौर पर यह देखना अहम होगा कि उपजिलाधिकारी की ओर से भेजी गई पट्टा निरस्तीकरण रिपोर्ट पर जिलाधिकारी स्तर से कब निर्णय लिया जाता है और सील तोड़े जाने तथा कथित अवैध निर्माण से जुड़े आरोपों की जांच होती है या नहीं। साथ ही भुजियाघाट-सूर्यगांव क्षेत्र में कृषि भूमि पर चल रही अन्य व्यावसायिक गतिविधियों की जांच को लेकर भी प्रशासन क्या कदम उठाता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

