हाईकोर्ट शिफ्टिंग मामले में फैसला सुरक्षित, सरकार के बयान पर गरमाई बहस

हाईकोर्ट शिफ्टिंग मामले में फैसला सुरक्षित, सरकार के बयान पर गरमाई बहस

स्थान : नैनीताल
ब्यूरो रिपोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से बेलबाबा, हल्द्वानी शिफ्ट किए जाने के मामले में सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से दिए गए बयानों को लेकर कोर्ट में तीखी बहस देखने को मिली। हाईकोर्ट शिफ्टिंग को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब इस मामले में हाईकोर्ट कभी भी अपना निर्णय सुना सकती है।

सुनवाई के दौरान सतत विकास को लेकर सरकार की ओर से रखे गए पक्ष पर भी चर्चा हुई। सरकार की ओर से कहा गया कि सतत विकास की संभावनाएं हल्द्वानी में अधिक हैं। इस बयान को लेकर पहाड़ी क्षेत्रों के विकास और वहां बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठने लगे हैं। मामले ने अब राजनीतिक रंग भी लेना शुरू कर दिया है।

हाईकोर्ट की शिफ्टिंग को लेकर राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि इस संबंध में प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है। हालांकि सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से इस बात से इनकार किया गया कि उसे ऐसा कोई प्रस्ताव प्राप्त हुआ है। कोर्ट रूम में इस मुद्दे को लेकर दोनों पक्षों के बीच गरम बहस हुई।

हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने के फैसले को अधिवक्ता रमन साह की ओर से दायर याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि भारत सरकार की अधिसूचना के तहत हाईकोर्ट की स्थापना नैनीताल में की गई है। ऐसे में राज्य सरकार केवल कैबिनेट के निर्णय के आधार पर हाईकोर्ट को हल्द्वानी शिफ्ट करने का फैसला कैसे ले सकती है, इस पर सवाल उठाया गया है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि हाईकोर्ट की स्थापना और स्थान परिवर्तन से संबंधित अधिकार केंद्र सरकार के स्तर पर निहित हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष यह सवाल रखा गया कि जब हाईकोर्ट की बेंच नैनीताल में स्थापित करने को लेकर भारत सरकार की अधिसूचना मौजूद है, तो राज्य सरकार को अकेले स्थान परिवर्तन का निर्णय लेने का अधिकार किस सीमा तक है।

मामले में नैनीताल के जिलाधिकारी की ओर से वन विभाग की भूमि उपलब्ध कराने को लेकर जारी पत्र को भी चुनौती दी गई है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि रिजर्व फॉरेस्ट की भूमि को किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपलब्ध कराने की प्रक्रिया क्या है और जिलाधिकारी को इस संबंध में कितना अधिकार प्राप्त है।

सुनवाई के दौरान वन भूमि से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी चर्चा हुई। याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए विभिन्न आदेशों का हवाला देते हुए वन भूमि के इस्तेमाल को लेकर निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का मुद्दा उठाया गया। इससे मामले का कानूनी दायरा और व्यापक हो गया है।

सरकार की ओर से सतत विकास को लेकर दिए गए पक्ष पर उत्तराखंड क्रांति दल ने भी सवाल खड़े किए हैं। यूकेडी ने सरकार के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पहाड़ों में विकास की संभावनाओं को नकारना उचित नहीं है। पार्टी ने सरकार से पहाड़ी क्षेत्रों में विकास और बुनियादी सुविधाओं को लेकर स्पष्ट नीति सामने रखने की मांग की है।

फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत का निर्णय इस पूरे विवाद के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट का आदेश हाईकोर्ट की शिफ्टिंग, वन भूमि और राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानूनी सवालों की दिशा तय कर सकता है।

मामले में आगे की कानूनी लड़ाई की संभावनाएं भी बनी हुई हैं। यदि हाईकोर्ट के फैसले के बाद कोई पक्ष असंतुष्ट रहता है तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। ऐसे में हाईकोर्ट का आने वाला फैसला आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। वन भूमि से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों को देखते हुए यह विवाद जल्द समाप्त होने के बजाय आगे भी कानूनी स्तर पर जारी रहने की संभावना है।