हरेला पर्व: उत्तराखंड में पर्यावरण और संस्कृति का अनूठा संगम

हरेला पर्व: उत्तराखंड में पर्यावरण और संस्कृति का अनूठा संगम

स्थान : हल्द्वानी
ब्यूरो रिपोर्ट

उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला बुधवार को पूरे प्रदेश में श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। लोगों ने एक-दूसरे को हरेला अर्पित कर सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना की। गांवों से लेकर शहरों तक इस पर्व की विशेष रौनक देखने को मिली।

हरेला उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व लोगों को पर्यावरण संरक्षण, हरियाली और प्रकृति से जुड़ने का संदेश देता है। इस अवसर पर कई स्थानों पर वृक्षारोपण कार्यक्रम भी आयोजित किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया।

पारंपरिक मान्यता के अनुसार हरेला की बुवाई हर वर्ष 7 जुलाई को की जाती है। घरों में सात प्रकार के अनाज मिट्टी से भरे पात्रों में बोए जाते हैं। लगभग नौ दिन बाद, 16 जुलाई को इन अंकुरित पौधों को काटकर परिवार के बड़े-बुजुर्ग सभी सदस्यों के सिर पर रखकर आशीर्वाद देते हैं और पर्व मनाते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि हरेला केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अच्छी वर्षा, समृद्ध खेती और भरपूर फसल की कामना का भी प्रतीक है। किसान इस पर्व को कृषि चक्र की शुरुआत और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के रूप में भी मनाते हैं।

उत्तराखंड में हरेला को हरियाली, खुशहाली और जीवन के नवसृजन का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व के माध्यम से नई पीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण, वृक्ष लगाने और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व के प्रति जागरूक किया जाता है। यही कारण है कि हर वर्ष इस अवसर पर हजारों पौधे लगाए जाते हैं।

प्रदेश के विभिन्न जिलों में सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा हरेला पर्व के उपलक्ष्य में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए। लोकगीत, पारंपरिक नृत्य, पौधारोपण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से लोगों ने अपनी लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखने का संदेश दिया।

हरेला पर्व उत्तराखंड की पहचान और प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध का प्रतीक है। यह त्योहार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, कृषि समृद्धि और सामाजिक एकता का संदेश भी देता है। बदलते समय में भी हरेला की परंपरा लोगों को अपनी संस्कृति और प्रकृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है।