

ब्यूरो रिपोर्ट


वैश्विक ऊर्जा राजनीति में पिछले पांच दशकों के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है। 1970 के दशक में तेल के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर रहने वाला अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीति ने वैश्विक शक्ति संतुलन को नई दिशा दी है।


वर्ष 1973 में अरब-इजरायल युद्ध के दौरान ओपेक के अरब देशों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा था। तेल की कीमतों में भारी उछाल आया, पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग गईं और आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुईं।



इस संकट के बाद अमेरिका ने ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना लिया। भविष्य में किसी भी तेल संकट से निपटने के लिए उसने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तैयार किए और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के साथ घरेलू तेल उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया।

अमेरिका के लिए सबसे बड़ा बदलाव तथाकथित ‘शेल क्रांति’ साबित हुई। नई तकनीकों के जरिए शेल चट्टानों से तेल और गैस निकालने की क्षमता विकसित होने के बाद अमेरिकी उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका ने रूस और सऊदी अरब जैसे पारंपरिक तेल उत्पादकों को भी चुनौती देना शुरू कर दिया।
वर्ष 2015 में अमेरिका ने लगभग 40 वर्षों से लागू कच्चे तेल के निर्यात प्रतिबंध को समाप्त कर दिया। इसके बाद अमेरिकी तेल वैश्विक बाजारों में पहुंचने लगा और अमेरिका ऊर्जा आयातक से ऊर्जा निर्यातक देश के रूप में उभरा।

विश्लेषकों का मानना है कि इसी दौरान मध्य पूर्व में जारी संघर्ष, ईरान-इराक युद्ध, इराक में सैन्य हस्तक्षेप और ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा क्षमता को प्रभावित किया। इससे वैश्विक तेल बाजार में अमेरिका की स्थिति और मजबूत होती गई।


वर्तमान समय में मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते खतरे ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार को चिंतित कर दिया है। हालांकि अब अमेरिका पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मनिर्भर है और ऐसे संकटों का प्रभाव उस पर अपेक्षाकृत कम पड़ता है।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत ने आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका और रूस से तेल आयात बढ़ाया है, लेकिन लंबी दूरी और बढ़ती परिवहन लागत के कारण ऊर्जा आयात महंगा हो रहा है, जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

