चकलुवा में धूमधाम से मनाया गया सातु आंठू लोक पर्व, भावुक विदाई के साथ माता गौरा को किया विदा

चकलुवा में धूमधाम से मनाया गया सातु आंठू लोक पर्व, भावुक विदाई के साथ माता गौरा को किया विदा

स्थान :कालाढूंगी
ब्यूरो रिपोर्ट

कालाढूंगी के चकलुवा क्षेत्र में कुमाऊं का पारंपरिक लोक पर्व सातु आंठू धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया गया। सात दिनों तक चले इस पर्व के अंतिम दिन क्षेत्र में धार्मिक और सांस्कृतिक रंग देखने को मिला। बड़ी संख्या में क्षेत्रवासियों ने पर्व में शामिल होकर अपनी परंपराओं को निभाया।

पर्व के अंतिम दिन भगवान शिव माता गौरा को विदा कर अपने साथ ले जाते हैं। इस परंपरा के तहत क्षेत्रवासियों ने माता गौरा को अपनी बेटी मानकर भावुक विदाई दी। इस दौरान लोगों ने माता गौरा से परिवार और क्षेत्र में सुख-समृद्धि की कामना की।

माता गौरा की विदाई के दौरान महिलाओं और श्रद्धालुओं में भावुकता देखने को मिली। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विदाई की रस्म पूरी की गई। पूरे क्षेत्र में श्रद्धा और आस्था का माहौल बना रहा।

सातु आंठू पर्व के आयोजन में कुमाऊं की समृद्ध लोक संस्कृति की भी झलक देखने को मिली। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ लोकगीत और सांस्कृतिक परंपराओं ने आयोजन को खास बना दिया। लोगों ने उत्साह के साथ पर्व में भाग लिया।

लोक कलाकार एवं पूर्व सैनिक पुरन सिंह मेहरा ने बताया कि सातु आंठू पर्व मूल रूप से सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में विशेष रूप से मनाया जाता है। यह पर्व कुमाऊं की लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने बताया कि चकलुवा क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में ऐसे परिवार रहते हैं, जो अपनी जन्मभूमि की संस्कृति और परंपराओं को आज भी जीवंत रखे हुए हैं। इसी कारण सात दिनों तक पर्व को पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया।

पर्व के दौरान नई पीढ़ी को भी कुमाऊं की लोक परंपराओं से रूबरू होने का अवसर मिला। बुजुर्गों और लोक कलाकारों ने पारंपरिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों के बारे में लोगों को जानकारी दी।

पुरन सिंह मेहरा ने कहा कि अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने के लिए ऐसे आयोजनों का होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि इससे बच्चों और युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ने तथा सांस्कृतिक विरासत को समझने की प्रेरणा मिलती है।

सातु आंठू पर्व के समापन पर क्षेत्रवासियों ने माता गौरा को भावुक विदाई देकर सुख-समृद्धि की कामना की। आयोजन ने एक बार फिर कुमाऊं की समृद्ध लोक संस्कृति, आस्था और परंपराओं को जीवंत रूप में सामने रखा।