‘चीड़ अभिशाप नहीं, किसानों के लिए वरदान’, हरेला पर्व पर वैज्ञानिक ने बताई आय बढ़ाने की नई राह

‘चीड़ अभिशाप नहीं, किसानों के लिए वरदान’, हरेला पर्व पर वैज्ञानिक ने बताई आय बढ़ाने की नई राह

स्थान : पौड़ी
ब्यूरो रिपोर्टर

उत्तराखंड में हरेला पर्व के अवसर पर जहां प्रदेशभर में बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान चलाया जा रहा है, वहीं भरसार वानिकी एवं एग्रीकल्चर महाविद्यालय की वैज्ञानिक एवं असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. स्नेहा डोभाल ने किसानों के लिए वानिकी आधारित खेती को आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बताया है। उनका कहना है कि चीड़ और चंदन जैसे वृक्ष किसानों की आय दोगुनी नहीं बल्कि कई गुना तक बढ़ाने की क्षमता रखते हैं।

डॉ. डोभाल ने कहा कि अधिक से अधिक पेड़ लगाने से एक ओर पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिलेगी, वहीं दूसरी ओर किसानों को दीर्घकालिक आर्थिक लाभ भी मिलेगा। उन्होंने युवाओं से वानिकी के क्षेत्र में करियर बनाने और आधुनिक कृषि-वानिकी तकनीकों को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि इस क्षेत्र में रोजगार और स्वरोजगार की व्यापक संभावनाएं हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में चीड़ को अक्सर अभिशाप के रूप में देखा जाता है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में चीड़ के जंगलों के नीचे विभिन्न औषधीय पौधों की सफल खेती की जा रही है, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उत्तराखंड में भी इस मॉडल को अपनाकर बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

वैज्ञानिक के अनुसार चीड़ के नीचे उगाए जाने वाले कई औषधीय पौधों को जंगली जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते। ऐसे में उन क्षेत्रों के किसानों के लिए यह एक बेहतर विकल्प बन सकता है, जहां बंदर, सूअर और अन्य वन्यजीवों के कारण पारंपरिक खेती प्रभावित हो रही है। इससे खेती छोड़ चुके किसानों को भी दोबारा कृषि की ओर आकर्षित किया जा सकता है।

डॉ. स्नेहा डोभाल ने चंदन की खेती को भी किसानों के लिए अत्यधिक लाभकारी बताते हुए कहा कि इसकी देखभाल अपेक्षाकृत कम होती है और लंबे समय में इसका आर्थिक प्रतिफल सामान्य फसलों की तुलना में कई गुना अधिक हो सकता है। उन्होंने कहा कि यदि वैज्ञानिक पद्धति से चंदन की खेती की जाए तो यह किसानों के लिए मजबूत आय का स्रोत बन सकती है।

उन्होंने किसानों से पारंपरिक खेती के साथ कृषि-वानिकी और औषधीय पौधों की खेती को अपनाने की अपील की। उनका कहना था कि कम मेहनत, कम रखरखाव और बेहतर बाजार मूल्य के कारण यह मॉडल भविष्य में उत्तराखंड के किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और हरित विकास को भी नई दिशा दे सकता है।